home page

वृद्ध होने में और बूढ़ा होने में बहुत अंतर है, हर व्यक्ति को इसे समझने की जरूरत

 | 
There is a lot of difference between growing old and becoming old, every person needs to understand this

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
सफेद बाल हो जाना, या निष्क्रिय हो जाना, बूढ़ा हो जाना या फिर वृद्ध हो जाना, क्या एक ही बात है? बिल्कुल नहीं, यह समझने की भूल कभी मत करना। अधिकतर लोग इन चारों में अंतर समझ ही नहीं आता है, क्योंकि हमने कभी इसे गहनता से समझने का प्रयास ही नहीं किया। युवा दोस्तों, हिंदी भाषा का कोई शब्द किसी का प्रयाय नहीं है भले ही हम इसे पढ़ते है, और पढ़ाते है। हमारी परीक्षाओं में एक शब्द के पर्यायवाची शब्द पूछे जाते है, कितनी बचकानी बाते है ये,  कितना गहरा चिंतन है ये, इसे पुनः विमर्श में लेने की जरूरत है क्योंकि कभी भी कोई शब्द एक शब्द का प्रयाय हो ही नहीं सकता है, नया शब्द तभी गढ़ा जाता है जब उसकी परिस्थिति स्थिति के अनुसार आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि हर शब्द का अलग अर्थ होता है। ऐसे ही तो हम वृद्ध, और बूढ़ा शब्द को एक अर्थ में समझकर नासमझी करते है। मै यहां भारतीय संस्कृति की एक बहुत महत्वपूर्ण परंपरा के बारे में बताना चाहता हूँ, प्रिय युवाओं हमारे यहां जब कोई शादी विवाह के कार्यक्रम होते है तो हम उस विवाह कार्यक्रम के लिए एक वृद्ध तय करते है, जिसे अक्सर हम वृद्ध लेना कहते है। इस वृद्ध को कौन लेता है या लेती है, यह बड़ा ही महत्वपूर्ण है।

इस वृद्ध को हम बस एक शब्द मात्र समझते है, जो भी बुजुर्ग होता है या होती है वो इस भूमिका को निभाने का कार्य संपन्न करते है, लेकिन ये वृद्ध शब्द कोई आम शब्द नहीं है यह कोई बुजुर्ग होना नहीं है या ये कोई उम्र का बड़ा होना नहीं है। वृद्ध लेने का शुद्ध अर्थ है जिम्मेदारी लेना, जवाबदेही लेना अर्थात उस विवाह कार्यक्रम की सम्पन्नता तक उस वृद्ध लिए हुए व्यक्ति को वो स्थान छोड़ना नहीं होता है, इसे भले ही लोगों ने बिना जानकारी के कारण शकुन अपशकुन से जोड़ दिया हो, परंतु ऐसा कुछ नहीं है, वृद्ध का अर्थ केवल यही है कि हम किसी भी बड़े विवाह आदि कार्यक्रम के लिए एक समझदार व जिम्मेदार व्यक्ति को तय करते है अर्थात वह कार्यक्रम उनकी अध्यक्षता में आयोजित किया जाता है,

इसीलिये उस व्यक्ति को उस जगह पर बने रहने की जरूरत होती है ताकि हर बात का ख्याल किया जा सकें। यहां बूढ़ा होने का अर्थ है उम्र से बड़ा होना, शक्ति में क्षीण होना, कमजोर होना या फिर किसी कार्य को करने में अक्षम हो जाना है। लेकिन वृद्ध होने का अर्थ है, संपूर्णता प्राप्त करना, ज्ञान को प्राप्त करना अर्थात विचारों में विशालता आना, विचारों में विस्तार आना, संकीर्णता का त्याग ही तो वृद्ध होना है यानि बड़ा होना है, तर्कशील होना है, न्यायकारी होना है, निष्पक्ष होना है, ईमानदार होना है, निर्मल होना है, सत्य को प्राप्त करना है।

WhatsApp Group Join Now

वृद्ध होने का अर्थ बूढ़ा होना नहीं है, बल्कि ज्ञान की मंजिल पर पहुंचना है, जवाबदेही लेने की पराकाष्ठा पर पहुंचना है, तभी तो उसे वृद्ध लेने को कहा जाता है ताकि उसकी देखरेख में सभी कार्य बेहतरीन तरीके से संपूर्णता से सम्पन्न हो सकें। बूढ़ा तो उम्र का बिताना है, शक्तिहीन होना है, क्षीण होना है लेकिन इसके विपरित वृद्ध होने का अर्थ विशाल होना है, गहरा होना है, अथाह होना है, सत्य के साथ खड़ा होना है, राष्ट्र के साथ खड़ा होना है, सही को सही और गलत को गलत कहने की ताकत ही वृद्ध होना है, जीवन की परिपक्वता को प्राप्त करना है, जीवन की श्रेष्ठता प्राप्त करना है, खुद की पहचान को समाज में विलीन करना है। भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज ने श्रीमद्भगवद् गीता के दसवें अध्याय में कहा है कि मैं सभी श्रेष्ठ अवस्थाओं में विराजमान हूँ, जैसे नदियों में मै गंगा हूँ, ज्योतियों में मै सूर्य हूँ, नक्षत्रों में मै चंद्रमा हूँ, सभी वृक्षों में मै पीपल हूँ, वेदों में मै सामवेद हूँ।

अब आप सभी ये कहेंगे कि इसकी चर्चा यहां क्यों कर रहे है, हां मैं इस महत्वपूर्ण विमर्श को इसलिए ले रहा हूँ कि जो परिपक्व है, श्रेष्ठ है, जो सम्पूर्ण है उसमें भगवान श्रीकृष्ण जी विराजमान है अर्थात जो वृद्ध है जो परिपक्व है, जो विवेकवान है, वो सबकी सुनने वाला है, वो सबको स्नेह करने वाला है, वो निष्पक्ष है, जो सबको ध्यान में रखकर निर्णय करता है, वही तो बड़ा है, वही तो विस्तृत है। बूढ़ा व्यक्ति वो होता है जिसके बाल पक गए है, जो क्षीण हो गया है, जिसकी उम्र बढ़ गई है, जिसमें शक्ति नहीं है, लेकिन वृद्ध वो है उम्र के साथ साथ धैर्यवान है, समझ रखता है,

सभी को सभी के दृष्टिकोण से समझने की क्षमता रखता है और समझ व सहजता से निर्णय लेता है, ताकि सभी के कल्याण की बात हो सकें और कोई भी बड़ा कार्यक्रम उनकी देखरेख में अच्छे से सम्पन्न हो सकें। हमारे तो ग्रामीण क्षेत्र में आज भी ये रिवाज है, लेकिन इसका अर्थ कम ही लोग समझते है। आमतौर पर हम वृद्ध एवं बुढा होने एक ही मतलब लगाते है, परंतु वृद्ध होना ही परिपक्वता का लेवल होता है। जब हम कभी कभी बात करते कि फलां व्यक्ति उम्र में तो बहुत बड़ा है, लेकिन उसमें समझ कम है, वो अच्छे बुरे का ख्याल नहीं करता है, सही को सही तथा गलत को गलत कहने का साहस नहीं होता है तो लगता है कि यह व्यक्ति मैच्योर नहीं हुआ है। बस हम अर्थ समझने में ही गलती करते है कि वृद्ध होना क्या है व बूढ़ा होना क्या है?

बालों का सफेद होना बिल्कुल भी परिपक्व होना नहीं है। मै यहां कोई इन दो शब्दों के अर्थ को बताने के लिए नहीं लिख रहा हूं, मै यहां केवल अपने रीति रिवाजों की चर्चा कर रहा हूँ, जिसे हमारे बुजुर्गो ने उस समय इस प्रकार की व्यवस्था की, जिसमें उन्होंने अपने सभी महत्वपूर्ण कार्यों जैसे शादी विवाह या उन्ही के बराबर अन्य कार्यक्रमों के आयोजन में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी सौंपते है जिसे हमारे बुजुर्गो ने वृद्ध का नाम दिया था, जिसे वर्तमान में हम गंभीरता से नहीं ले रहे है, जिसकी वजह से विवाह शादियों में युवा पीढ़ी अपनी चलाती है, अपने अनुसार अनाप शनाप खर्चा करवाते है, अपने ही युवा दोस्तों को इंप्रेस करने के लिए अपने ही बुजुर्गो को इग्नोर करते है, जिसकी वजह से बुजुर्ग शादियों में जाने से भी कतराते है। भले ही हमारे बुजुर्ग पढ़े लिखे कम थे, लेकिन उनकी समझ बहुत उच्च श्रेणी की थी, कि वो सभी कार्यक्रमों को नैतिकता के साथ आयोजित करने का जज्बा रखते थे, इसीलिए हमारी  संस्कृति की इतनी गहरी जड़ें है। ऐसी परम्पराओं को हमारी नई पीढ़ी को भी समझने की जरूरत है और ऐसी व्यवस्था को सशक्त करने की जरूरत है। हमारी नई पीढ़ी को अपने घर में या अपने समाज में कोई तो ऐसा व्यक्ति रखना चाहिए जिसमें समझ हो, जिनके साथ अपने दुख तक़लीफ शेयर किया जा सकें, अपने जीवन या करियर के लिए सलाह मशवरा कर सकें,

अपने जीवन की गरिमा को बनाए रखने के लिए भी कोई एक व्यक्ति तो हो जो हमारे जीवन के लिए दीप स्तंभ बन सकें, जो राह दिखा सकें। इसके लिए हमारी युवा पीढ़ी को अपने बुजुर्गो के अनुभवों की कद्र करने की आदत डालनी चाहिए, ताकि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को और उच्चाइयों पर ले जा सकें। यहां वृद्ध होना बूढ़ा होना नहीं है, बल्कि वृद्ध होना एक पद की तरह है, एक जिम्मेदारी की तरह है, जिसे हमारे बुजुर्गो ने बेहतर ढंग से समझा था, जिसे हम तो बिल्कुल नहीं समझ पा रहे है।

हम तो अपनी बेहतरीन संस्कृति को छोड़कर पश्चिमी संस्कृति के पीछे दौड़ रहे है, खुद की रुचि को छोड़कर दूसरे के कार्यों के पीछे दौड़ रहे है, यही वो कारण है जिससे कोई भी व्यक्ति भटकता है। वृद्ध होना मतलब बेहतरीन होना है, अगर किसी महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो तो वृद्ध बनने की कौशिश करनी चाहिए, किसी वरिष्ठ पद पर होना भी तो वृद्ध होना है, क्योंकि वरिष्ठता हर प्रकार की जवाबदेही मांगती है, हर प्रकार की नैतिकता मांगती है। जीवन को वृद्धता की ओर लेकर जाना ही तो अंतिम लक्ष्य होता है, जिसे अक्सर हम भुला देते है और नई पीढ़ी को वर्षों के अनुभवों से वंचित कर देते है। आओ अपनी एक एक रिवाज को समझने का प्रयत्न करें, उन्हें पाखंड न बनने दें। स्वयं को समाज व राष्ट्र को समर्पित करें, जीवन को न्यासदार बनकर राष्ट्र की सेवा करें, बस यही वानप्रस्थ है, बस यही संन्यास है।
जय हिंद, वंदे मातरम