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जब देश के बड़े बड़े व्यक्तियों के चरित्र गिरते है तो पूरे राष्ट्र को नुकसान होता है, आमजन का चरित्र भी गिरता हैं

 
When the character of the great people of the country falls, then the entire nation suffers, the character of the common people also falls
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 When the character of the great people of the country falls, then the entire nation suffers, the character of the common people also falls

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
महर्षि कणाद द्वारा रचित वैशेषिक सूत्र 1.1.2 में लिखा है कि " यतो अभ्युदय निःश्रेषस सिद्धि: स धर्म:" अर्थात सभी ओर हर प्रकार का तथा सभी का भौतिक विकास तो हो, लेकिन उसके साथ साथ आत्मा का भी विकास होना चाहिए, आचरण भी बेहतर बने यानी आत्मिक विकास भी अवश्य होना चाहिए, उसे ही धर्म कहा जाता है।  हम भौतिक विकास तो करें, लेकिन आत्मा का पतन नहीं होना चाहिए। कुछ लोग सोचते है कि भौतिक विकास पर तो ध्यान देना चाहिए, चाहे मानव उत्थान की तरफ भले ही ध्यान मत दो।

यहां एक बात बड़ी स्पष्ट है कि अगर मानवता का उत्थान करना है तो अपनी आत्मा को किसी भी कीमत पर गिरने नहीं देना है। इसे और स्पष्ट किया जा सकता है कि अगर भौतिक विकास करना है करो, परंतु उसमें बेईमानी, चोरी, चालाकी, असत्यता, अन्याय नहीं होना चाहिए, यही तो कणाद वैशेषिक सूत्र का सीधा सीधा अर्थ होता हैं। इसका एक दूसरा पक्ष भी जो वर्तमान में पूरी दुनिया में फैल रहा है कि बस भौतिक विकास हो, सड़के बनें, इमारतें बने, बहुमंजिले भवन बने, चारों तरफ जगमगाती रौशनी फैलाने वाली लाइट्स भी लगे, परंतु मानव जीवन की ओर ध्यान ही ना दो, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की ओर ध्यान ही न दो, तो ये खोखला विकास बहुत दूर तक नहीं जा पाएगा, क्योंकि जो भी हम भौतिक विकास करते है तो उसके आधार में तो मानवता का विकास, मानवता की खुशहाली, तथा इंसान को शांति, प्रसन्नता तथा खुशी प्रदान करें,

उसी को ही हम वास्तविक या दैविक विकास मानते है। अगर हम सब कुछ चकाचौंध बना दे लेकिन ह्यूमन बीइंग को अंधकार में छोड़ दें, समाज में अज्ञानता को महिमामंडित करते है, अपराधिक प्रवृति के लोगों के सहारे भौतिक विकास तो कर लेते है, लेकिन हम उसी आधार को भूल जाते है जो विकास का मुख्य आधार है, उसी को खंडित करेंगे तो इस पृथ्वी पर शांति, खुशहाली तथा प्रसन्नता स्थापित नहीं हो पाएगी।

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भारतीय संस्कृति तथा हमारे सभी महापुरुषों वा महर्षियों ने मानव उत्थान की ही बात की है, इंसान में मानवता को स्थापित करना ही तो उनका मुख्य लक्ष्य हैं। उन्होंने जो शास्त्र लिखे, जो संहिताएं लिखी वो सभी तो मानव निर्माण के लिए ही तो है। हमारे सभी पवित्र ग्रंथ रामायण, श्रीमद्भगवद् गीता, उपनिषद, महाभारत की नैतिक शिक्षा , सभी ने तो मानव निर्माण की ही बात की है। यहां किसी ने कोई सड़क या इमारतें बनाने के लिए नहीं  लिखा है। यहां जीवन को सदपथ दिखाने की ही बात की है। भारतीय संस्कृति में घर के बड़े बुजुर्ग नैतिक निर्माण की ही तो बात करते है। हमे चरित्रवान बनाने के लिए ही तो सभी नीति शास्त्र लिखे गए हैं।

हमारे यहां तो युद्ध के लिए भी नैतिकता के नियम तय किए गए थे। महाभारत जैसे युद्ध में भी युद्ध के नियम थे। जीवन अपने दायित्व व उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत होने से चलता है। श्रीमद्भगवद् गीता के तीसरे अध्याय के 21 वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज ने कहा है कि " यद्यदा चरती श्रेष्ठस्ततदेवेतरों जन: । स यत्प्रमाणम कुरूते लोकस्तदानुवर्तेत।।" अर्थात जैसा आचरण बड़े लोग करते है वैसा ही आचरण उनके अनुयायि भी करने लगते है। इसका अर्थ यह हुआ कि बड़े बड़े महानुभावों को या जो बड़े बड़े पदों पर आसीन है

उन्हें अपना आचरण बहुत ही अच्छा रखने की जरूरत है तभी नीचे स्तर पर कार्यरत लोगों का आचरण भी अच्छा होगा। जैसे अगर बच्चों को चारित्रिक शिक्षा देनी है तो उसके लिए मातापिता को भी अपना चरित्र श्रेष्ठ रखना होगा। अध्यापक का चरित्र श्रेष्ठ होगा तभी वो विद्यार्थियों को श्रेष्ठ चरित्र बनाने की शिक्षा दे पाएंगे,

क्योंकि विद्यार्थी, बच्चें या नीचे स्तर पर कार्य करने वाले भी अपने बड़ों का ही तो अनुसरण करते है और उन्हीं को देखकर अपना जीवन जीते है। मानव जीवन उच्चतम मूल्यों के साथ जीने की जरूरत है, जीवन मूल्यों से पथभ्रष्ट होने का अर्थ है कि हम आत्मिक पतन की ओर बढ़ रहे है और यही सनातन संस्कृति के विरुद्ध है, यही भारतीय जीवनशैली के विरुद्ध है। शास्त्रसम्मत आचरण के लिए सभी को पांच बातों का पालन करना चाहिए, जैसे;
1. अपने आचरण को कभी अपने पद से प्रभावित न होने दो, अगर पद के अनुसार बड़ी जिम्मेदारी है तो नैतिकता के पालन की भी उतनी बड़ी जवाबदेही होनी चाहिए।


2. अपने बच्चों की परवरिश भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखकर करने का संकल्प लेना चाहिए।
3. अपने पद को भारतीय शास्त्र सम्मत रखें, जिससे कभी आत्मिक पतन ना हो पाए, आचरण ऐसा होना चाहिए, जिसका अनुसरण करने में सभी गर्व महसूस करें।
4. मानव मूल्यों तथा जीवन मूल्यों का पालन करते हुए ही अपनी जीवनशैली निर्धारित करें।
5. चाहे कितने भी बड़े पद पर हो, अपना तथा अपने बच्चों के जीवन में राष्ट्र व समाज के प्रति दायित्व तथा उत्तरदायित्व का बोध अवश्य होना चाहिए।


  भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वोच्च्य संस्कृति है, जिसमें न केवल मानव कल्याण तथा उत्थान की बात है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण एवं वसुधैव कुटुंबकम् रुपी जीवन जीने का उच्चतम सूत्र भी है। हम सभी को भारतीय मूल्यों के अनुसार ही अपनी दिनचर्या तय करनी चाहिए।
जय हिंद, वंदे मातरम