कुंभक बलम सर्व बलम" इस महावाक्य को क्रिया के रूप में देश का हर विद्यार्थी अभ्यास करें, ताकि वो सशक्त बनें
Mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
भगवान शिव और पार्वती के उग्र रूप भैरव से भैरवी ने प्रश्न किया कि हे महादेव, "किम बलम सर्व बलम" ? अर्थात दुनिया में सबसे बड़ा बल कौन सा है, इसका उत्तर देते हुए भैरव महाराज ने कहा था कि "कुंभक बलम सर्व बलम" अर्थात प्राणायाम की पूरक, रेचक, और कुंभक क्रिया में कुंभक क्रिया सबसे बलशाली है। इस क्रिया से न केवल शरीर बलवान बनता है बल्कि मानसिक व आध्यात्मिक रूप से भी व्यक्ति शक्तिशाली बनता है। इसी लिए इस कुंभक क्रिया को सर्व बलम की संज्ञा दी गई है। ये प्रकिया सामान्यतया प्राणायाम के तीन स्तर है,
जिसमें सांस अंदर भरना, सांस भीतर ही रोकना तथा सांस को धीरे धीरे बाहर छोड़ना है। इन्हीं तीन स्तरों को अर्थात सांस अंदर खींचने को पूरक क्रिया कहा जाता है, सांस को भीतर रोकने की क्रिया को कुंभक क्रिया तथा सांस को धीरे धीरे बाहर छोड़ने की क्रिया को रेचक क्रिया कहा जाता है, इसमें भी सांस को बाहर निकालकर सांस रोकने को बाह्य कुंभक कहते है। इन तीनों क्रियाओं को ही प्राणायाम का एक चक्र बोलते है। प्राणायाम में सबसे महत्वपूर्ण हमारा सांस है, जिसके माध्यम से हम ऑक्सीजन ग्रहण करते है, वही ऑक्सीजन अंदर रोककर कुंभक का रूप धरती है। कुंभक वो क्रिया है जिसमें पेट में और चेस्ट में सांस को रोका जाता है, वैसे कुंभक का अर्थ भी पेट में रोकना ही होता है,
कुंभ का अर्थ घड़ा भी होता है। स्वांस को अंदर रोकना या स्वांस को बाहर निकालकर जब बिना सांस लिए रहते है तो उसे कुंभक क्रिया कहा जाता है। भगवान शिव के एक रूप भैरव से मां पार्वती ने भैरवी के रूप ने प्रश्न किया था कि " किम बलम सर्व बलम" अर्थात भैरवी ने पूछा था कि स्वामी इस संसार में कौन सा बल सबसे बड़ा बल है तब इसके उत्तर में भैरव बाबा ने कहा था कि" कुंभक बलम सर्व बलम"। अर्थात कुंभक बल ही सबसे शक्तिशाली बल है। युवा विद्यार्थियों को मै इसे एक उदाहरण से भी समझाने का प्रयास कर रहा हूं, जिससे हर युवा को इसका तात्पर्य समझ में आएगा, अर्थात जब भी हम कठोर कार्य करते है, या वजन उठाने का काम करते है, या किसी वस्तु को धक्का देने का कार्य करते है, या पुल अप, पुश अप व्यायाम करते है तो हमे सांस भर कर भीतर रोकने की आवश्यकता पड़ती है
उसी को तो हम कुंभक क्रिया कहते है। जीवन में जब भी हम बल लगाने वाला कार्य करते है तो हम सांस रोककर ही उसको पूरा करते है। इसके विपरित अगर हम सांस को बाहर निकाल कर कोई कार्य करने की कौशिश करे तो उसमें सफलता नहीं मिलती है और इससे शारीरिक नुकसान भी होता है। कुंभक क्रिया से जो बल मिलता है उससे बड़ा बल कोई नहीं होता है। भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज ने इसे श्रीमद्भगवद् गीता के चौथे अध्याय के 29 वें श्लोक में भी उपदेशित किया है, जैसे " अपाने जुहवती प्राणम प्राणअपाने तथा परे।
प्राणपानगति रुद्धवा प्राणायाम परायण:।।" कितने ही योगी जन बाहर जाने वाले प्राण को अंदर आने वाले प्राण में हवन करते है, कितने ही योगी जन अंदर आने वाले प्राण को बाहर जाने वाले प्राण में हवन करते है और कुछ दोनों प्राणों का हवन करते है, इसमें दोनों प्राणों के रुकने की क्रिया को कुंभक कहा गया है जिससे व्यक्ति शारीरिक रूप से तथा मानसिक रूप से सशक्त बनते है। कुंभक क्रिया अभ्यास करने से विकसित होती है, जिससे हमारे फेफड़े, हृदय, सशक्त बनते है और शरीर की भीतरी संरचना भी मजबूत होती है। इससे कोई भी व्यक्ति अपनी जीवनी शक्ति को मजबूत करने में सफल होता है। कुंभक क्रिया से भीतर रोकी गई ऑक्सीजन शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद मिलती है और शरीर वा प्राण सशक्त होते है, जीवटता बढ़ती है, संकल्प शक्ति में बढ़ोतरी होती है,
शरीर से किसी भी प्रकार की रुग्णता को बाहर निकालने में भी सहयोग मिलता है। प्राणायाम एक ऐसी क्रिया है जिससे हम अपनी कुंभक क्रिया को अधिक समय तक रोकने में कामयाब होते है। यह क्रिया धीरे धीरे विद्यार्थियों को या युवाओं को अपने मन को नियंत्रित करने तथा ध्यान को एकाग्र करने में भी सहयोगी बनती है। जब विद्यार्थी का मन भटकता है, मन में विचलन पैदा होता है या उसका ध्यान पढ़ाई से भागता है तो प्राणायाम के माध्यम से उसे कंट्रोल किया जाता है। सांसों को भीतर रोकने की क्रिया ही हमारे मन को संकल्पशील बनाता है, इससे सांस की गति को धीमा करने में भी सहारा मिलता है, सांसों का यही धीमापन हमारे विचलन वा मन की उग्रता को नियंत्रित करता है, सांसों का यही धीमापन विद्यार्थियों को मन की स्थिरता प्रदान करता है, यही तो विद्यार्थियों को भटकाव से बचाने में सहयोगी है,
लेकिन यह क्रिया अपने आप में भी तो ठहराव मांगती है। इसके अभ्यास के लिए हर व्यक्ति को, विशेषकर युवा विद्यार्थियों को कुछ नियम के साथ पांच स्टेप्स को अपनाने की आवश्यकता है, जैसे;
1. शुरुआत में आंख बंद करके बैठने का अभ्यास करने की जरूरत है।
2. कुछ दिन के बाद सामान्य प्राणायाम करने के अभ्यास को अपनाने की आवश्यकता है।
3. अगले चरण में धीरे धीरे स्वांस लेने व छोड़ने की प्रक्रिया का अभ्यास करना है।
4. इसके अगले स्टेप में केवल पांच पांच पांच सेकंड्स के फार्मूले के अनुसार पूरक, कुंभक तथा रेचक क्रिया करने का अभ्यास करें।
5. एक सप्ताह बाद प्राणायाम की क्रिया 1: 4: 2 के अनुपात में करने का अभ्यास करें, अर्थात अगर एक सेकंड में सांस खींचते है, तो चार सेकेंड्स रोकना है और दो सेकंड्स में सांस छोड़ने का अभ्यास करना है, इसमें जितना जरूरी कुंभक क्रिया है, उतना ही सांस छोड़ने की क्रिया भी है, इसे धीरे धीरे छोड़ने की प्रैक्टिस करें।
विद्यार्थियों को अगर अपने जीवन को अपने लक्ष्य पर फोकस करना है तो प्राणायाम का अभ्यास करना ही होगा, अन्यथा वर्तमान में मन को विचलित करने की क्रियाएं तो चारों ओर चल ही रही है, कहीं मोबाइल का प्रभाव है, कहीं उस पर चलने वाली विभिन्न एप्स है, कही फास्ट फूड है, जंक फूड है, कहीं अन्य गतिविधियां है। इसलिए विद्यार्थियों के पास प्राणायाम व उसमें भी कुंभक क्रिया ही एक मात्र स्किल है जिससे वो न केवल मन को नियंत्रित कर सकते है बल्कि अपने स्वास्थ्य को भी ठीक रख सकते है। सभी युवा व किशोर विद्यार्थियों को प्रण लेना चाहिए कि वो आज से ही अपने जीवन को प्राणायाम से जोड़ेंगे।
जय हिंद, वंदे मातरम
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
