आर्यसमाजियों ने मनाया महर्षि दयानंद का जन्मोत्सव, बोद्धोत्सव हवन में डाली आहूतियां
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सिरसा आर्यसमाज बेगू रोड स्थित सिरसा में महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्मोत्सव व बोद्धोत्सव के शुभ अवसर पर आर्यसमाजियों ने भूपसिंह गहलोत के नेतृत्व में हवन यज्ञ किया। इस दौरान उन्होंने उपस्थित आर्यजन हवन में आहूति डालकर पुण्य के भागी बने। आर्यसमाज बेगू रोड के कार्यकारी प्रधान भूपसिंह गहलोत ने इस मौके पर बताया कि महर्षि दयानंद का जन्म फागुन बदी दसवीं विक्रमी सम्वत 1881 में गांव टंकारा प्रांत मोर्वी गुजरात में हुआ।
उनका बचपन का नाम मूलशंकर था। शिवरात्रि के अवसर पर पिताजी के साथ शिवमंदिर में शिव के दर्शन के लिए गए, उस समय उनकी आयु 14 वर्ष की थी। आधी रात को जब सब पुजारी सो गए, तब कुछ चूहे आए, प्रसाद खाया, मलमूत्र किया और शिवलिंग पर उछलकूद करने लगे। यह देखकर मूलशंकर को बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि शिव के बारे में बड़ा महत्व सुन रखा था। ये ड्रामा देखकर उनका सब भ्रम टूट गया कि जो शिव चूहों से अपनी रक्षा नहीं कर सकता, वह हमारी क्या रक्षा करेगा? इससे मूलशंकर का मूर्ति पूजा से विश्वास उठ गया और सच्चे शिव की प्राप्ति की लालसा जाग उठी। अपनी जन्मस्थली टंकारा को त्यागते समय महर्षि जी के जीवन में दो प्रमुख लक्ष्य थे।
सच्चे शिव की प्राप्ति तथा मृत्यु पर विजय। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने घोर तपस्या की और योग की अनेक सिद्धियां प्राप्त की। वर्ष 1860 में एक दिन चाणौद के जंगलों में स्वामी पूर्णानंद के दर्शन हुए। मूलशंकर ने स्वामी जी से शिक्षा ली और दयानंद बन गए। स्वामी जी के परामर्श से मथुरा में व्याकरण के सूर्य प्रजाचक्षु स्वामी विरजानंद के पास पहुंचे। कुटिया का दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई, कौन? दयानंद ने कहा कि गुरुवर मैं यही जानने आया हूं कि मैं कौन हूं? अढ़ाई साल तक गुरु चरणों में बैठकर अष्टाध्यायी, महाभाष्य, वेदार्थ सूत्र व अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया।
दक्षिणास्वरूप में एक लोंग की जगह गुरु का आदेश था कि मेरे द्वारा दिए गए ज्ञान का प्रचार करना। दयानंद जी ने सबसे पहला उद्घोष किया कि वेदों की ओर लौटो, पाखंड को छोड़ो। उन्होंने तर्क और प्रमाण के आधार पर सिद्ध किया कि वेद इस विज्ञान है। वेद का ज्ञान वह प्रकाश है जो अज्ञानता के अंधकार को दूर करता है। इस कार्य को पूरा करने के लिए उन्होंने आर्यसमाज की स्थापना की। अमरग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश की रचना की। सर्वप्रथम आजादी की आवाज उठाई।
वे स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह व महिलाओं के अधिकारों के प्रबल समर्थक थे। आज ये बेटियां पढ़ लिखकर जीवन की ऊंचाईयां छू रही हैं, इसमें स्वामी जी की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि सभी को उस महामना के विचारों को आत्मसात करना चाहिए जिन्होंने सत्य, धर्म, राष्ट्रसेवा के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अंत में प्रसाद वितरण के साथ सभा का समापन किया
