हरियाणा को मिलेगा 1280 क्यूसेक पानी, अमित शाह की मौजूदगी में लगी मुहर, 30 साल बाद 6 राज्यों में समझौता
mahendra india news, new delhi
हरियाणा प्रदेश में पेयजल व सिंचाई पानी की परेशानी झेलनी पड़ती। अब यह समस्या हल होने वाली है। दशकों से अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना पर 6 प्रदेशों के बीच हुए समझौते व अन्य साधनों से हरियाणा को करीबन 1280 क्यूसेक पानी मिलने का रास्ता साफ हो गया है। हरियाणा के लिए इन परियोजनाओं का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि राज्य लगातार ऊपरी यमुना में भंडारण बढ़ाने की मांग करता रहा है। 2018 में लखवार परियोजना पर राज्यों के बीच सहमति बनी। इसके बाद रेणुकाजी परियोजना के क्रियान्वयन के लिए 2019 में समझौता हुआ। दोनों परियोजनाओं से यमुना में पानी की उपलब्धता बढऩे की उम्मीद है।
2026 में हरियाणा-राजस्थान के बीच 1994 के यमुना जल समझौते को लागू करने के लिए अलग एमओयू हुआ, जिसके तहत राजस्थान को उसके हिस्से का पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
ऐसे में किशाऊ समझौता हरियाणा के लिए केवल एक नई परियोजना नहीं, बल्कि लंबित अंतरराज्यीय जल समझौतों को आगे बढ़ाने और भविष्य की पानी की जरूरत सुरक्षित करने की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में 6 प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के बीच हुए समझौते के बाद हरियाणा प्रदेश के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि इस पानी का उपयोग प्रदेश में सिंचाई और पेयजल योजनाओं को मजबूत करने के लिए किया जाएगा।
हरियाणा के लिए पानी की कमी वाले यह समझौता यमुना बेसिन में भविष्य की जल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीएम नायब सैनी ने कहा कि कई दशक से परियोजना लटकी थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयास से अब आगे बढऩे जा रही है।
आपको बता दें कि उत्तराखंड-हिमाचल सीमा पर टोंस नदी पर बनने वाली परियोजना में 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर जल संग्रहण होगा। परियोजना से 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन प्रस्तावित है। इसका करीब 90 फीसद खर्च केंद्र सरकार उठाएगी। इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ भी सीमित रहेगा।
विवाद की पृष्ठभूमि में 1994 का यमुना समझौता
वैसे बता दें कि किशाऊ का मामला नया नहीं है। छह ऊपरी यमुना बेसिन राज्यों ने 12 मई 1994 को यमुना के पानी के बंटवारे और मानसूनी पानी के भंडारण के लिए समझौता किया था। इसके तहत किशाऊ, रेणुकाजी और लखवार जैसी भंडारण परियोजनाओं पर अलग-अलग समझौते होने थे।
लेकिन प्रदेशों के बीच पानी, बिजली और परियोजना लागत के बंटवारे को लेकर सहमति नहीं बन पाई और किशाऊ करीब तीन दशक तक अटका रहा। 1994 में किशाऊ परियोजना को लेकर अलग समझौता भी हुआ था।
