वृद्धजन सेवा के क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करने से अच्छा है भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत को जिंदा रखे
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 14 दिसंबर 1990 को 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने की घोषणा की। तभी से प्रत्येक वर्ष एक अक्टूबर का दिवस वृद्धजन दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत हुई। वृद्धावस्था मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें कोई भी व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों वा मूल्यों को नई पीढ़ी को स्थानांतरित करते है। इस अवस्था में व्यक्ति अपनी शारीरिक असमर्थता व मानसिक कमजोरी के कारण दूसरों पर आश्रित भी हो जाते है। संस्कृतिविहीन विकास की धारा में बुजुर्गो के महत्वपूर्ण ज्ञान वा अनुभवों को नकारते हुए वो कहीं पीछे छूट जाते है, इन्हें संभालने की जिम्मेदारी खुद उनके बच्चे भी नहीं उठाना चाहते है। वसुधैव कुटुंबकम् का विमर्श लेकर आगे बढ़ने वाली भारतीय संस्कृति में अपने ही मातापिता को सम्मान ना देना, वास्तव में चिंतन का विषय है। बड़े बड़े धनाढ्य लोगों को भी वृद्धावस्था में ये स्थिति झेलनी पड़ती है, उनके बच्चें भी मातापिता को अपने साथ रखना नहीं चाहते है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पहले तो वृद्धावस्था आश्रमों की व्यवस्था की गई,
लेकिन उनकी देखरेख व्यवस्थित न होने के कारण अब ऐसी बहुत सी आवासीय व्यवस्था आ गई है जो केवल बुजुर्गो के लिए ही डेडीकेटेड है, उनमें रहने के लिए व्यवस्थित कमरे, सामूहिक किचन, इनडोर खेलों की व्यवस्था, प्रातः काल वॉक के लिए स्थान भी बनाए गए है। जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते है तो ये मर्यादा श्रीराम वा भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज द्वारा स्थापित मूल्यों पर चलने वाली संस्कृति होनी चाहिए थी, जहां मातापिता सर्वोपरि की स्थिति में आने चाहिए थे। हमारे यहां सजीव को संभालने की बजाय निर्जीव को पूजने का चलन बन गया है। जीवित मातापिता की केयर करने के बजाय मूर्तियों के पूजन में अधिक भाव प्रकट करते है, जीवित गाय को पालने की बजाय गाय की मूर्ति अपने घर में रखकर, शो करने की रिवाज चल पड़ी है। जीवित मातापिता की सेवा ना करके उनके पिंडदान, तेरहवीं के दिन खर्चा करने की प्रथा व्यर्थ है, हरे भरे पेड़ों को करवा कर पार्कों में कंक्रीट के पेड़ बनाकर सजावट करने से कोई लाभ होने वाला नहीं है, नदियों में गंदगी डालकर गंगा को मां कहने में किसी को शर्म नहीं आती है, बड़े बड़े बूचड़ खाने चलाने वालों के मुंह से गौ सेवा की बात बेमानी लगती है, गरीबों के मुंह से निवाला छीनने वालों द्वारा की जाने वाली सामाजिक सेवा के कोई मायने नहीं है, किसी के घर को छीनकर अमर्यादित विकास के की मायने नहीं होते है।
हमारे जीवन में दिखावा बढ़ता जा रहा है, पहाड़ों को पूजने की बजाय वहां जाकर कचरा फैलाना, शराब पीना, पिकनिक मनाना आजकल लोगों की आदत बन चुकी है। जिस परिवार के बच्चें धार्मिक स्थलों के दर्शन करने व पुजारियों, मौलवियों, या किसी भी कर्मकांड करने वाले को हजारों लाखों रुपए खर्च करते है वो ही लोग अपने मातापिता के नजर के नए चश्मे बनवाने में असमर्थता व्यक्त करते है। हम निर्जीव वस्तुओं के आदि हो गए है क्योंकि एक तो उसमें कुछ खर्च नहीं होता है, दूसरे जिम्मेदारी से बच जाते है। एक तरफ हमारे युवाओं में बढ़ती फ्रस्ट्रेशन बताती है कि भारत जैसी संस्कृति में भी बच्चों का पालन पौषण सही नहीं हो रहा है, हमारे यहां बच्चों के क्रोध, असंयम की स्थिति, असहमति की स्थिति, असंतोष की भयंकर दौड़ ने हमारी सनातन संस्कृति को भी पीछे छोड़ दिया है। जहां कण कण में ईश्वर को देखा जाता है वहां मातापिता में ईश्वर क्यों नहीं दिखता है।
हमारे बुजुर्ग हमारा मार्ग दर्शन करते थे, हमे बहादुरी की कहानियां सुनाते थे, उन्हें वर्तमान में बच्चें अपने साथ रखना नहीं चाहते है, जिसके कारण नई पीढ़ी के छोटे बच्चों में विचलन, कुंठा बढ़ती जा रही है, अहंकार बढ़ता जा रहा है। अगर हम विज्ञान की बात करे या ह्यूमन साइक्लॉजी की बात करें तो सिंगमंड फ्राइड जैसे महान चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट के अनुसार 0 से छह वर्ष के बच्चों का पालन पौषण मां के आंचल में होना चाहिए या फिर दादी के आंचल में होना चाहिए। इस आयु के बच्चों के पालन पौषण में उनके ओरल, एनस तथा फैलिक संतुष्टि का होना बेहद जरूरी है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में जब मातापिता दोनों ही नौकरी करते है तो बच्चों को ये तीनों संतोष कैसे मिलेंगे।
ओरल अवस्था यानी उन्हें एक वर्ष की आयु तक उचित समय तक मां का दूध पिलाया जाए, उन्हें मां की गोद में रहने से असुरक्षा की भावना खत्म होती है। एनस अर्थात जब बच्चा पॉटी करता है तो उसे मां द्वारा या दादी के द्वारा धोने पर बच्चे को एक प्रकार का संतोष मिलता है। फैलिक अवस्था में बच्चा तीन वर्ष की आयु से छह वर्ष की आयु तक अपने जननांगों की पहचान करता है, उस समय उन्हें मातापिता या दादा दादी के स्नेह की आवश्यकता होती है। यहां कहने का तात्पर्य यह है कि जो बच्चें अपने दादा दादी के पास पलते है उनमें अधिक ह्यूमन वैल्यूज होते है। उनके मानव मूल्य उनके व्यक्तित्व में झलकते है, वो सभी से स्नेह करते है, वो साहसी होते है, निर्भीकता उनके व्यक्तित्व में दिखती है। उनके जीवन में कभी कुंठा पैदा नहीं होती है, वो सभी का सम्मान करते है। जब किसी भी बच्चे के मातापिता उन्हें उनके दादा दादी से वंचित करते है तो वो भारतीय संस्कृति ही नहीं बल्कि बच्चों के पालन पौषण के वैज्ञानिक सिद्धांतों को नकारते है, जिसके कारण वो अपने ही बच्चों के जीवन को खतरे में डालने का कार्य करते है। भले ही हम वृद्धावस्था की देखभाल को अधिक रोजगार के साधन के रूप में देख रहे है, जैसे अन्य पश्चिमी संस्कृतियों में हो रहा है, लेकिन ये मानव उत्थान के मूल्यों के साथ जबरजस्त छेड़छाड़ है, इससे ना केवल समाज में अंतोष बढ़ेगा बल्कि हम मानव मूल्यों को खोने के साथ साथ मानवता को जड़ से उखाड़ने का अकल्याणकारी कार्य भी करेंगे। हम अपनी छोटी छोटी तुच्छ सी इच्छाओं को पूरा करने के लिए क्यों अपने मातापिता या दादा दादी को अलग कर देते है? इच्छाएं भी क्या है, जिसे जानकर खुद पर हंसी आनी चाहिए, जैसे; कोई हमे किसी भी गलत सही बात पर टोके नहीं, घर में कैसी भी भाषा उपयोग करें तो कोई रोकटोक न हो, कैसे भी कपड़े पहने, कहीं भी जाएं, घर में कोई भी आवे, घर में बहुओं द्वारा भी भारतीय संस्कृति के विरुद्ध कपड़े पहने जाएं, सुबह देर तक सोते रहे, सेहत का ध्यान न रखकर पश्चिमी संस्कृति के पिछलगु बने, घर में बिना रोकटक शराब पियो, नशा करो,
बिना रोक टोक कहीं भी जाओ , रात में देर से घर आना, जो वास्तव में एक आयु के बाद स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाला होता है, केवल इतनी दी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम अपने पेरेंट्स या ग्रांडपरेंट्स को अपने पास नहीं रखना चाहते है, क्योंकि वहां रोक टोक है, वहां सभ्यता है, वहां संस्कार है, वहां स्वास्थ्य है, वहां जीवन की मर्यादाएं है। दोस्तों, मातापिता को या दादा दादी को साथ रखना कभी भी घाटे का सौदा नहीं होता है। वह आपके बच्चों की देखभाल करते है, उनको संस्कार देते है, उनके भोजन का ख्याल रखते है, उन्हें मानव मूल्यों की शिक्षा देते है, हमारे पेरेंट्स मल्टीटास्किंग संसाधन है, जो जीवन में खुशी भरते है, अनुभव शेयर करते है, जो तुम्हारी फिक्र करते है, बच्चों में हौंसला, हिम्मत तथा उत्साह भरते है, आपके घर को सदैव सजीव रखते है। ये कार्य कोई भी लाखों रूपये खर्च करके भी नहीं करा सकते है। इसलिए बुजुर्गो की देखभाल में रोजगार ढूंढने से अच्छा है कि हम अपने बुजुर्गो की सेवा करें , उन्हें सहारा दे, और भारतीय संस्कृति के वासुदेव कुटुंबकम् के सिद्धांत को फलीभूत करें।
जय हिंद, वंदे मातरम
