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चोटी रखना, टोपी पहनना, गले में क्रॉस पहनना, तिलक लगाना धर्म नहीं है, ये पूजा पद्धति व प्रतीक है, युवाओं को धर्म समझना है

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Keeping a braid, wearing a cap, wearing a cross around the neck, applying tilak is not religion, these are worship methods and symbols, the youth have to understand religion

 mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जीवन की भागदौड़ में, आपाधापी में, द्वंद्व में नैतिकता कहीं खो गई है, बिना नैतिक मूल्यों के हर कोई धार्मिक बनने के दिखावे में लगे हुए है। वशिष्ठ स्मृति वा देवी भागवतम में कहा है कि " आचारहीनम ना पुनंती वेद: अर्थात आचरण हीन व्यक्ति को वेद भी शुद्ध नहीं कर सकते है यानि वह कितना भी ज्ञानी क्यों ना हो, चाहे उसने वेद के छह अंग पढ़े हो, उपनिषद पढ़े हो, श्रीमद्भगवद् गीता पढ़ी हो, बाइबल या कुरान या फिर गुरुग्रंथ साहेब पढ़ा हो, लेकिन वह समाज के या राष्ट्र के काम का नहीं होता है, उसे हमारे पवित्र ग्रंथ वेद भी पवित्र नहीं कर सकते है। रावण भी तो बहुत ज्ञानी थे, उन्होंने भी तो भगवान शिव को प्रसन्न करके वरदान पाए थे, लेकिन आचरण अच्छा ना होने के कारण, अहंकार होने के कारण ही श्रीराम जी ने उनका वध किया था,

इसी लिए तो वह बुराई में गिने जाते हैं, इसी लिए तो बुराई रूपी पुतले को जलाया जाता है, इसमें सीखने लायक विशेष बाद यह है कि हम किसी भी बुराई को खत्म, जड़ से खत्म करने के लिए पुतला फूंक रहे है, किसी व्यक्ति को समाप्त करना ध्येय नहीं है, अगर ऐसा होता तो फिर तो सभी बुराइयां खत्म हो चुकी होती, परंतु ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि हम तो व्यक्ति को जला रहें है, बुराई को तो हम छूते ही नहीं है, हमने कब कहा कि हम बुराई का पुतला जला रहे है, अगर ऐसा होता तो हम कहते कि दशहरे के दिन बुराई, अहंकार का पुतला जला रहे है। यहां मनुष्य का धर्म उसका व्यवहार, उसके गुण , उसका आचरण ही तो है, जो उसके कर्तव्य में ही झलकता है, व्यवहार में ही तो झलकता है। धर्म, पूजा पद्धति नहीं है,

धर्म किसी भी प्रकार की वेशभूषा या प्रतीक या चिह्न पर निर्भर नहीं करता है, धर्म के तो लक्षण बताएं गए है, जिसे हर मनुष्य अपने भीतर धारण करता है और उन्हें अपने व्यवहार में उपयोग करता है। जैसे मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताएं गए है " धृति क्षमा दामोस्तेय शौचामिंद्रियनीगृह। धीर्विद्या सत्यमअक्रोधो दशकम धर्म लक्षणम"।। अर्थात ये दस लक्षण ही धार्मिक व्यक्ति को प्रदर्शित करते है। धृति यानी धीरज जिसने धारण किया है वही धर्म है, इसी तरह इन गुणों को धारण करने वाला व्यक्ति ही धार्मिक हो सकता है, जिसके व्यवहार में क्षमा नहीं है, जो सत्य नहीं बोलते है, जिसमें बुराइयों को अपने भीतर आने से रोकने का दम क्षमता नहीं है, जो इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर सकता है, जो बाह्य वा अंदर से शुद्ध नहीं है,

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जिसके पास विवेक, विजडम नहीं है, जिसके पास विद्या नहीं है, जो क्रोधी है, उसमें धर्म के लक्षण नहीं है, वो केवल दिखावा मात्र है भले ही वो लंबा तिलक लगाएं, भले ही वो जालीदार टोपी पहने, चाहे वो गले में क्रॉस पहनें, भले ही कोई कंधे पर कृपाण पहने, ये सभी प्रतीक है जिन्हें हमने पूजा पद्धति या पंथ की पहचान भर बना का छोड़ दिया है, क्योंकि जब हम धर्म की बात करते है तो कर्तव्य है जो हम सबके व्यवहार में झलकता है कि हम कितने बड़े धार्मिक है। यही धर्म के लक्षण गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी संपदा के नाम से उपदेशित किए गए है, धर्म तो व्यक्ति के व्यवहार में झलकता है, उसे लबादा की तरह ओढ़ा नहीं जा सकता हैं क्योंकि हर पंथ में एक ही ईश्वर है जिसे हम ओम कहते है, एक  ओंकार कहते है,

जिसे हम गॉड कहते है, जिसे आल्हा कहते है, वो ही पूजनीय है, वो ही कण कण में विराजमान है, वो सर्वत्र है, सर्वज्ञ है, वो ही सर्वशक्तिमान है, वो ही हर क्रिया को संचालित करता है। ईश्वर के अलावा कुछ भी सत्य नहीं है, वो ही सबका पालनहार है, वो करतार है, वो ही हर जीव में विराजमान है फिर भी हम क्यों एक दूसरे को छोटा बड़ा करके आंकते है। युवा साथियों, आपका जीवन कर्मठता से चलेगा, मेहनत से चलेगा, तप से चलेगा, ईमानदारी से चलेगा, विवेक से चलेगा, कोई पाखंड आपको जीवन ना तो सफलता दे सकता है, ना ही हैप्पीनेस, वा स्वास्थ्य दे सकता है, पाखंड एक व्यवसाय है जिसे सभी युवाओं को समझने की जरूरत है। साथियों झूठ फरेब की जिंदगी अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। हम सभी को हमारे धार्मिक प्रतीकों से धर्म को समझने की आवश्यकता है कि हमारे शास्त्रों में क्या लिखा है, हर पंथ का एक ही ध्येय वाक्य है और वो मानव उत्थान है, जिसे हम ह्यूमन डेवलपमेंट या मानव कल्याण भी कहते है, अगर हमारी कोई भी गतिविधि जीव कल्याण के विरुद्ध जा रही है तो फिर समझना होगा कि हम धर्म के विरुद्ध कार्य कर रहे है। यहां मानव कल्याण का अर्थ कुछ मानव का कल्याण नहीं इस धरती पर मौजूद सभी इंसानों का कल्याण है। धर्म हमे निष्पक्ष होना सीखता है अर्थात कुछ के पक्ष में नहीं, सभी के पक्ष का अर्थ, धर्म है,

कुछ के लिए न्याय नहीं सभी को न्याय मिले, कुछ को भोजन नहीं सभी को भोजन मिले, कुछ को क्षमा नहीं बल्कि सभी को क्षमा किया जाएं। व्यक्ति को क्षमा करना सीखो, लेकिन बुराइयां को नहीं। जब हम बुराई को क्षमा करते है और बार बार करते है तो बुराई बढ़ती है, उसे मानव उत्थान के जरिए ही दूर किया जा सकता है।  हमारे सभी सनातन शास्त्र कहते है कि सत्य ही ईश्वर है, यही जीवन का आधार है, इसी से जीवन चलता है और जीवन के बाद भी यही शेष रहता है जिसे हम विशेष कहते है, तभी तो जब कोई व्यक्ति मारता है तो यही बोला जाता है कि राम नाम सत्य है। कोई यह नहीं बोलता कि ये शरीर सत्य है, ये धन सत्य है, ये प्रॉपर्टी सत्य है, ये रिश्ते नाते सत्य है, पद प्रतिष्ठा सत्य, केवल राम नाम ही सत्य है इसी को जीवन में धारण करो।

ये दस लक्षण श्रीराम जी से ही उत्पन्न है, यही लक्षण श्रीराम वा श्रीकृष्ण जी महाराज ने धर्म को किए थे, तभी तो अहंकार का वध हुआ था, तभी तो दंभ का वध हुआ था चाहे वो रावण के रूप में हो चाहे वो कंश के रूप में हो, चाहे वो कुंभकर्ण के रूप में आलस्य को प्रदर्शित करने वाली शक्ति हो, चाहे वो दुर्योधन की विवेकहीनता हो, या फिर शराब वा मद में डूबे लोग हो, उसी का वध किया जाता है और वही मानव कल्याण मानव उत्थान के लिए आवश्यक है, तभी हमारे सारे संस्कार, संस्कृति, मानव मूल्य, नैतिक मूल्य, रिश्ते नातों की पवित्रता जीवित रह पाएगी, अन्यथा प्रतीकों या पूजा पद्धति से तो अहंकार ही जन्म लेता है, कि किसी की पूजा पद्धति अच्छी है, किस के प्रतीक सुंदर है, किस के रीति रिवाज अधिक अच्छे है। यहां सभी नदियों को एक ही समुद्र में मिलना है चाहे वो किसी भी रास्ते से जाएं, चाहे वो किसी भी नाम से बहे ,

चाहे वो किसी भी तरह से पूजी जाएं, लेकिन जाना सभी को एक समुद्र में है जिसे हम सर्वज्ञ, सर्वत्र, तथा सर्वशक्तिमान कहते है। युवाओं को अपने व्यक्तित्व का विकास धर्म के लक्षणों से करना है अर्थात वो सभी मानव मूल्य, वो सभी नैतिक मूल्य अपने भीतर धारण करने है जो धर्म की पहचान है और उन्हें ही अपने कर्तव्य के पालन के लिए व्यवहार में उतारना है, व्यवहार में दिखाना है, यही सच्ची ईश्वर भक्ति है।
जय हिंद, वंदे मातरम