दी आर्यन स्कूल : : रावण का पुतला नहीं, मन का अहंकार जलाना जरूरी: अनिल गोयल
mahendra india news, new delhi
सिरसा। दी आर्यन स्कूल में दशहरे का पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर स्कूल डायरेक्टर अनिल गोयल, राकेश गोयल, चारू गोयल व प्रिंसीपल श्वेता महेश्वरी ने स्टाफ सदस्यों व विद्यार्थियों के साथ मिलकर रावण के पुतले का दहन किया। इस मौके पर स्कूल डायरेक्टर अनिल गोयल ने सर्वप्रथम सभी को दशहरे के पावन पर्व की बधाई दी।
निदेशक ने कहा कि रावण के पुतले की बजाय अपने मन के अहंकार को जलाएं। उन्होंने कहा कि दशहरा अथवा विजयदशमी को असत्य पर सत्य की जीत अथवा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व कहा जाता है। मगर कभी सोचा है कि इसका अर्थ क्या है? रामलीला में ही नहीं, जीवन के हर अंश में नायक और खलनायक, अच्छे और बुरे आदमी पाएंगे। सिनेमा, स्कूल, नौकरी, व्यापार, परिवार, देश, समाज और दुनिया हर जगह दोनों तरह के लोग हैं। ऐसा लगता जरूर है कि दुनिया में बुरे आदमी की मौज रहती है, सोने की लंका उसी की है, मगर सच ये है कि एक दिन उसका अंत जरूर होता है।
इसलिए बच्चों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि वे नायक कैसे बनें, ऐसा क्या करें कि जीवन में उनकी जय-जयकार होए न कि पुतले जलाए जाएं। इस मौके पर प्रिंसीपल श्वेता माहेश्वरी ने कहा कि बच्चों और किशोरों का प्रिय पर्व विजयदशमी इस समझदारी के लिए सबसे बड़ा संकेत है। वे जीवन की रामलीला के नायक कैसे बनें।
कैसे संस्कार और स्वभाव उन्हें जीवन के किसी भी युद्ध में विजेता बनाएंगे। श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में गोस्वामी तुलसीदास वर्णन करते हैं कि राम-रावण का आमने-सामने युद्ध प्रारंभ होने से पहले विभीषण को चिंता हुई कि रामजी सभी साधनों से संपन्न रावण का मुकाबला कैसे करेंगे? रावण तो रथ पर सवार है और मेरे रामजी पैदल हैं, नंगे पांव हैं। यह बराबरी का मुकाबला ही नहीं है, तो वे कैसे जीतेंगे? राम-रावण युद्ध जैसी यह परिस्थिति हर व्यक्ति के जीवन में आती है, कई बार लगता है कि क्षमता से बड़ा काम, प्रतियोगिता, परिस्थिति अथवा लक्ष्य सामने है, तो जीत कैसे होगी? जो आपसे बहुत प्रेम करते हैं, वो कई बार इसको लेकर चिंतित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में आप उन्हें और सबसे बढक़र खुद को-कैसे भरोसा दिला सकते हैं कि जीत आपकी ही होगी।
