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अपने पराए का भाव ही हिंसा का मुख्य आधार है, अगर जीवन में निर्भयता चाहिए, तो श्रेय मार्ग अपनाना होगा

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The feeling of one's own and others' is the main basis of violence. If you want fearlessness in life, you will have to adopt the path of virtue

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
मानव जीवन असंतोष की ओर बढ़ रहा है, हर इंसान की गृहस्थ आश्रम वाली चाहत है, चाहे वो ब्रह्मचर्य आश्रम में हो, चाहे वो वानप्रस्थ आश्रम में हो या फिर संन्यास आश्रम में हो। त्याग तपस्या कहीं दिखती नहीं है, जब हम किसी भी प्रकार के संन्यास की बात करते है तो वहां सबसे पहले त्याग की बात सामने आती है, उसके उपरांत तपस्या आनी चाहिए लेकिन वर्तमान समय में हर कोई गृहस्थ आश्रम वाली सुविधाएं ही जीना चाहते है, अच्छा रहना हो, होटल के बेहतरीन कमरो में ठहरना हो, स्वादिष्ट भोजन हो, घूमने फिरने के लिए बड़ी बड़ी लक्जरी गाड़ियां हो, बड़े बड़े धनाढ्यों का साथ हो। कुछ महानुभाव इन सभी सुविधाओं को न्यायोचित ठहराने के लिए अपने अलग अलग तर्क देते है लेकिन ये तर्क किसी भी ऐसी बात को जस्टिफाई नहीं कर सकते है जो इसके आधारभूत मूल्यों के विपरीत  है,

जो हमारी भारतीय संस्कृति को प्रभावित करते हो, यहां सनातन संस्कृति की ही बात कर रहा हूं, क्योंकि जब हम भारत में रहते है तो इसे भारतीय संस्कृति कहना ज्यादा उचित लगता है ताकि हमारा आधार संकुचित न हो। यहां हर उन महानुभावों को ये समझना बेहद आवश्यक है कि जब संन्यास आश्रम की बात होती है तो ये सुविधाएं जीवन में संन्यास आश्रम के गुण या उसके लिए जरूरी दैवी संपद का निरूपण नहीं कर पाती है। अब देखिए संन्यास के लिए सत्य एक जरूरी गुण है, त्याग एक जरूरी गुण है, तपस्या एक जरूरी गुण है, अस्वाद एक जरूरी गुण है, असंग्रह एक जरूरी गुण है, न्याय एक जरूरी गुण है,  निर्मोह एक जरूरी गुण है, निर्भयता एक बेहद आवश्यक गुण है, तो फिर इन सुविधाओं के बीच में ये गुण कैसे विकसित होंगे?

इस बात को तो समझने की जरूरत है। मोटे मोटे गद्दों पर सोने वाले लोग कैसे योगी बन पाएंगे, स्वादिष्ट भोजन करने वाले लोग कैसे त्यागी बन पाएंगे, बड़ी बड़ी लक्जरी कारों में चलने वाले महानुभाव कैसे पैदल चल पाएंगे, भीड़ के बीच में रहने वाले लोग कैसे मौन वा एकांतवास कर पाएंगे। जीवन में ये सभी गुण त्याग और तप से आते है, अन्यथा जीवन तो सुविधाओं का गुलाम रहेगा, जो जीवन में ना तो नैतिकता विकसित होने देंगे, ना मानव मूल्यों को विकसित होने देंगे, और ना ही हमारी दैवी संपदों को आने देंगे। जीवन कंफर्ट जोन का गुलाम बनकर रह जाएगा, और जब कोई भी व्यक्ति चाहे वो कैसी भी बात करते हो, कितनी भी उच्च श्रेणी की चर्चा करते हो, परंतु उनकी चर्चा में केवल सुविधाओं को ही अहमियत से लिया जाता है,

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कैसे धन की प्राप्ति हो, वो ही उनका स्तर होता है, जो निहायत ही चिंतनीय है। जीवन अज्ञानता या अंधकार से नहीं चलता है, जीवन केवल ज्ञान वा प्रकाश की आभा से चलता है। युवाओं व नई जेनरेशन के  चरित्र निर्माण में संन्यास आश्रम अधिक लाभ दे सकता है, लेकिन वहां चरित्र निर्माण के प्रशिक्षण होने चाहिए। अगर संन्यास आश्रम ही गृहस्थ की तरह हो जाएगा तो फिर हमारी सनातन संस्कृति को आगे कौन लेकर जाएगा। इंसान को तप कौन सिखाएगा, इंसान में त्याग की भावना कैसे आएगी, इंसान को असंग्रह की भावना कौन सिखाएगा, निर्लोभ कैसे आएगा, यही तो भारतीय संस्कृति का आधार है। कोई शिक्षण संस्थान किसी विद्यार्थी के चरित्र निर्माण का बीड़ा नहीं उठा सकता है, ये कार्य तो संन्यास आश्रम को ही करना पड़ेगा। जीवन में बढ़ते तनाव, बढ़ती चिंता या बढ़ते अवसाद को संन्यास आश्रम ही दूर कर सकता है परंतु उसे शुद्ध संन्यास आश्रम की तरह रखना होगा। सारे तनाव की जड़ ही सुविधाएं है, सारे अवसाद की जड़ ही अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा है और सारे भय की जड़ ही द्वेष, अपना पराए का भाव है,

अगर इन सभी से मुक्ति पानी है तो जीवन में त्याग वा तप का सहारा लेना होगा। योग दर्शन में अष्टांग योग की चर्चा की गई है उसे हर घर तक लेकर जाने में जो अथक प्रयत्न पतंजलि योग पीठ ने किया है शायद ही कोई कर पाएगा। योग दर्शन हर इंसान को उसमें दिए गए यम नियम का ज्ञान कराता है और यही तो त्याग और तप से जोड़ने की शिक्षा देते है। बिना मेहनत के जीवन में खुशी आ ही नहीं सकती है, क्योंकि बिना मेहनत के मिला धन, बिना मेहनत के मिली संपति, बिना मेहनत के मिली पहचान, अधिक दिन तक नहीं रहती है और ना ही वो किसी भी इंसान में संतुष्टि के भाव उत्पन्न करती है, क्योंकि मेहनत करने में ऊर्जा की खपत होती है, ज्ञान का सहारा लेना पड़ता है, अहंकार को त्यागना पड़ता है, मानवीय गुणों को सीखना पड़ता है, और वही इंसान को वास्तव में आनंद प्रदान करते है, वहीं इंसान को स्ट्रॉग बनाते है, उसी से जीवन में हैप्पीनेस के द्वार खुलते है, बिना मेहनत वा ज्ञान के मिली किसी भी प्रकार की सुविधा या तो इंसान में अहंकार पैदा करेगी या फिर मूढ़ता पैदा करेगी। जब तक हम योग दर्शन के यम को नहीं जानेंगे, उनको जीवन में धारण नहीं करेंगे, हमारे भीतर दैवी संपदा आ ही नहीं सकती है। श्रीमद्भगवद् गीता के सोहलवें अध्याय के पहले तीन श्लोक दैवी संपद को ग्रहण करने के लिए ही तो है। जब तक हम इनका अध्ययन नहीं करते है, योग दर्शन के यम नियम का अध्ययन नहीं करते है, धर्म के दस लक्षणों को ग्रहण नहीं करते है , तब तक जीवन को अपने पराए से आजाद कर ही नहीं पाएंगे।

इन सभी गुणों को जीवन में धारण करना ही तो स्वर्ग है, यही तो इंसान को मूलाधार से सहस्त्र चक्र की यात्रा के लिए तैयार करते है, यही तो ओशो की संभोग से समाधि की अवधारणा है, और यही तो योग दर्शन के दर्शन है। जीवन को त्याग से जोड़ना ही ब्रह्मांडीय शक्ति के साथ जोड़ना है, अन्यथा इन्हीं भौतिक संसाधनों को संग्रह करने में ही जीवन निपट जाएगा, परंतु निर्भय, निष्पक्ष, न्यायकारी नहीं बन पाएंगे। यहां एक बात बहुत ही स्पष्ट कहने की आवश्यकता है कि मानवीय मूल्यों को जितनी ठेस संन्यास आश्रम ने पहुंचाई है शायद ही इतनी तो गृहस्थ आश्रम ने भी नहीं पहुंचाई है। ह्यूमन वैल्यूज का संरक्षण नहीं कर पाया संन्यास आश्रम, मानव मूल्यों को नई पीढ़ियों में हस्तांतरित नहीं कर पाया संन्यास आश्रण, इसके दो ही कारण है, पहला शास्त्रों के ज्ञान के विपरीत चलना और दूसरा संन्यास आश्रम के नियमों का पालन ना करना। जीवन में शांति या संतुष्टि का मिलना व अवसाद से मुक्ति संन्यास आश्रम से ही मिल सकती थी, लेकिन यहां तो संन्यास आश्रम ही गृहस्थ की ओर बढ़ गया है। वहां तो गृहस्थ आश्रम से भी अधिक सुख सुविधाएं है, वहां गृहस्थ से भी अधिक चकाचौंध है, वहां तो गृहस्थ से भी अधिक विदेश भ्रमण है, वहां तो गृहस्थ से भी अधिक भटकाव है, तो फिर कहां जाए इंसान अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को लेकर, किस से पाएं इन सभी का निदान, यहां तो अधिक अपना पराया है, यहां तो अधिक संकीर्णता है। हमारे पास हमारे सनातन शास्त्रों का ज्ञान है, युवा पीढ़ी को कभी कभी अपने शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए,

क्योंकि संन्यास आश्रम से किसी को त्याग तप की शिक्षा नहीं मिल पाएगी। भारतीय संस्कृति, सनातन संस्कृति जिस मानव उत्थान की बात करती है वो विश्व में कहीं नहीं मिलेगी, वो ज्ञान कहीं नहीं मिलेगा, वो संस्कार कहीं नहीं मिलेंगे। "वसुधैव कुटुंबकम्" और "अतिथि देवों भव:" की अवधारणा कहीं नहीं मिलेगी। " समरथ को नहीं दोष गुसाईं" जैसी चौपाई कहीं और नहीं मिलेगी और " स्वधर्म: निधनं श्रेय परधर्मों भयावह" जैसे गीता के श्लोक कहीं और नहीं मिलेंगे, लेकिन इनके सही अर्थ बताने वाले महानुभाव या इनको जीवन में उतारने वाले महानुभाव तो खुद इनको भूलकर गृहस्थ आश्रम की तरह जीवन जीने लगे है। आओ जीवन को उच्च मूल्यों से सुसज्जित करें, मानवीय मूल्यों से इस धरती को सजाएं, दैवीय गुणों से मानव का उत्थान करें, ताकि अपने पराए के इस भयावह रूप से पार पा सकें ताकि हमारी नई पीढ़ी, हमारे विद्यार्थी, हमारे युवा जीवन के राह को ज्ञान से प्रकाशित कर आगे बढ़ने का संकल्प लें सकें एवं भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में अपना योगदान दे सकें।
जय हिंद, वंदे मातरम