जो दुनिया छोड़कर चले जाते है, वो लौटकर कभी नहीं मिलते, इसलिए मातापिता से अच्छा व्यवहार करना सीखें
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
हम जिनकी गोद में पले है, खेलें है, जिनके स्नेह में अपना बचपन बिताया है, जिन्होंने हमे प्यार दुलार दिया, जिनके आंचल और छत्र छाया में हम बड़े हुए, वो सभी धीरे धीरे हमे छोड़कर जा रहे है। उनको दुनिया से जाते हुए देखकर बड़ी तकलीफ होती है, आंखों से अश्रु झरते है, उन्हें जाते हुए देखना बहुत मार्मिक दृश्य लगता है, बहुत याद आती है उनकी, बहुत याद आते है वो लोग, जो हमे छोड़कर चले जाते है। साथियों जिन मातापिता ने हमे जीवन की सभी खुशियां देने में पूरी जिंदगी गुजार दी, और कभी उफ तक नहीं की, उन्हें ही हम मिनिमम खुशी देने में भी कंजूसी करते है।
जो मातापिता, दादा दादी अपने बच्चों वा पोते पोतियों को अपने आंचल तथा स्नेह की छाया में रखकर कोई परेशानी नहीं होने देते है, उनका दुनिया से विदा होना, कोई छोटी घटना नहीं। मां वा बच्चों का जो रिश्ता होता है उसको परिभाषित करना बेहद मुश्किल कार्य है, यह ऐसा रिश्ता है जहां प्रेम की धारा बहती है, ये रिश्ता बड़ा ही स्नेहिल होता है। किसी भी बच्चे के लिए पहला प्यार मां का प्यार ही तो होता है। कोई भी बच्चा अपनी मां के शरीर से बनता है, उसका शरीर उनकी मां के शरीर का ही अंश होता है, फिर भी हम अपनी मां को क्यों भुला देते है। अपनी ही मां के प्रेम को क्यों इगनोर कर देते है,
अपनी मां जिसने अपना दूध पिला कर बच्चों को बड़ा करती है, उनको चलना सिखाती है, उठने बैठने की ट्रेनिंग देती है, उसके सभी दुख सुख में साथ खड़ी रहती है, उसे कैसे भुला जा सकता है, उसे कैसे भला बुरा कह सकता है कोई बच्चा। किसी भी इंसान के ऊपर पितृ ऋण होता है जिसे हम सबको उतारना होता है। जब हम अपने कंधे पर जो जनेऊ धारण करते है उसमें तीन धागे होते है जो तीन प्रकार के ऋण को प्रदर्शित करते है, जिसमें पहला देव ऋण, दूसरा पितृ ऋण और तीसरा ऋषि ऋण।
मनुष्य जीवन के सोलह संस्कारों में उपनयन संस्कार में यज्ञोपवीत से संस्कारित किया जाता है तभी कोई भी बच्चा द्विज बनता है अर्थात उसका दूसरा जन्म होता है अर्थात उन्हें जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है। यह संस्कार 8 वर्ष की आयु में किया जाता है उसके पश्चात बच्चा विशेष ज्ञान की ओर बढ़ता है। जनेऊ के तीन धागों में से एक धागा पितृ ऋण की याद दिलाता है जिसे हम बिना यज्ञोपवीत के कभी याद ही नहीं करते है। जो ऋण हमे उतारने चाहिए थे उनसे ऊऋण होने का हम कभी प्रयास ही नहीं करते है। यहां प्रश्न यह उठता है कि जो पहला ऋण है उसे उतारने के लिए हमे अपने मातापिता की सेवा करनी होती है तभी तो पितृ ऋण उतरेगा। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि पितृ आपके मातापिता है या अगर दादा दादी जीवित है तो वो भी पितृ है,उनके जीवन को सुखमय बनाना ही हम सबका कर्तव्य है। यहां यह बात स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि जो चले गए उनकी सेवा में दिखावा करने का कोई लाभ नहीं है। हमारे पितृ जो जीवित है वो चाहे मातापिता के रूप में बैठे है या दादा दादी के रूप में बैठे है नाना नानी के रूप में बैठे है, उन्ही को पितृ मानकर उनके द्वारा हमारे जीवन को सुंदर बनाने में जो जीवन खपाया है उसी से ऊऋण होना है।
उसके बाद देव ऋण अर्थात राष्ट्र ऋण जो हमे सारी सुविधाएं दे रहा है जिसमें सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि से भी ऊऋण होना चाहिए। ऋषि ऋण यानी जिन्होंने हमे शिक्षित किया, दीक्षित किया है उन विद्वानों के ऋण को भी उतारने की जरूरत होती है। जीवन में एक इंसान की सबसे बड़ी गलती यह होती है कि वो उन लोगों पर अधिक ध्यान देते है जिनका कोई ऋण उस पर है ही नहीं, और जिनका ऋण है उन्हें इगनोर करते है, पितृ उनमें ढूंढते है जो दुनिया छोड़कर चले गए है। अरे दोस्तो, हमारे पितृ हमारे मातापिता है उन्हें तृप्त करो, उन्ही की तृप्ति के लिए प्रयास करो, उनकी प्रशंसा करो, उनको खुश करना सीखो, उनको कड़वे वचन मत बोलो, उनका कहना मानो, उनसे बात करो, उनकी इज्जत करो, उनके बेहतरीन भोजन की व्यवस्था कराओ, उनको तीर्थ यात्रा कराओ। अरे इतना तो समझ में आता होगा कि जब विभिन्न देवताओं को अपने अपने वाहन को बेहतर साबित करना था तो भगवान शिव ने कहा था कि जो सबसे पहले इस पृथ्वी का चक्कर लगाकर आयेगा, उसी का वाहन बेहतर होगा,तो इस पर श्री गणेश जी ने वहां बैठे अपने मातापिता की परिक्रमा करने को ही पृथ्वी का चक्कर माना था
और उनके वाहन को ही सबसे तेज माना गया था, तो हम इस प्रतीक को क्यों नहीं मानते और समझते है। जिनके मातापिता भोजन के लिए भी तरसते है, दो मीठे बोल के लिए भी तरसते है, जो छोटी छोटी चीजों के लिए भी तरसते है, जो किसी बेटी को दस रुपए शगुन के रूप में देने को भी तरसते है ऐसी औलाद का कोई लाभ नहीं है, चाहे वो कितना भी देवी देवताओं को पूज ले, कितना भी श्राद्ध मना ले,कितने की तीर्थों पर जाकर ढोंग रच लें, कितना भी परिक्रमा कर ले, सच में कोई लाभ नहीं होने वाला है। जब हम शुभ लाभ की अवधारणा की बात करते है तो उस लाभ की शुभता तभी आती है जब घर में बैठे बुजुर्ग तृप्त है, जब घर बैठे बुर्जुगों की सेवा होती है, जब घर में बैठे बुजुर्गो का मान सम्मान होता है। कुछ बच्चे अक्सर कह देते है कि ये तो पेरेंट्स की ड्यूटी है कि बच्चों का पालन पौषण करें, हां उनकी ड्यूटी हैं लेकिन पालन पौषण में अपना ही पेट काटकर, अपनी सभी इच्छाओं को दबाकर जब बच्चों के जीवन के विषय में सोचा जाता है तो ऐसी ड्यूटी तो नहीं होती है ना।
फिर बच्चे अपनी ड्यूटी क्यों भूल जाते है, वो अपनी बीवी वा बच्चों के गुलाम क्यों हो जाते है, उन्हें अपनी पत्नी के सामने वो बुजुर्ग मातापिता क्यों नहीं दिखते है, उन्हें उनके शब्द क्यों कड़वे लगने लगते है, फिर बच्चों को उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा क्यों जहर लगने लगती है। जीवन बहुत छोटा है, तुम्हे भी बुजुर्ग बनते देर नहीं लगेगी, जवानी सदा नहीं रहनी है। मातापिता तो एक दिन दुख में या सुख में दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन तुम्हे भी उनकी जगह लेनी है उस दिन को याद करके विमर्श करने की कृपा करो। जो पेरेंट्स चले जाते है दोस्तो, वो लौट कर कभी नहीं आते है बस उनकी याद भर हमारे पास रहती है। जीवन में कुछ नहीं है थोड़ा कम संग्रह कर लोगे, थोड़ा कम खर्च कर लोगे, अपने तथा अपने बच्चों पर थोड़ा कम खर्च कर लेना, दिखावे में थोड़ा कम खर्च कर लेना, एक दो कपड़े कम खरीद लेना,परंतु अपने माता पिता के ऋण को पितृ ऋण समझकर जरूर उतार देना, यही समझ पैदा करने की जरूरत है। दोस्तों, कहीं जाने की जरूरत नहीं है मातापिता से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है, मातापिता से बढ़कर तुम्हारे ऊपर किसी का अहसान नहीं है, मातापिता से अधिक किसी ने तुम्हे स्नेह प्यार नहीं किया है, मातापिता से बढ़कर किसी ने तुम्हारी फिक्र नहीं की है, आधी रात में तुम्हारे लिए रोटी केवल तुम्हारी मां ही बना सकती है, मातापिता से बढ़कर किसी ने तुम्हे अपने कंधे पर नहीं बैठाया है, किसी ने तुम्हारी स्कूल कॉलेज की फीस नहीं भरी है, किसी ने तुम्हारे लिए नए कपड़े नहीं खरीदे होंगे, इसलिए हम सभी के ऊपर इतने पितृ ऋण है कि करोड़ों खर्च करके भी उनसे ऊऋण नहीं हो सकते है।
बस हमारे सामने इतना ही जीवन है कि आज से भी अगर हम अपने मातापिता को पितृ मानकर उनकी सेवा करना शुरू करें तो हमारी सभी भूलों को सुधारा जा सकता है। हां एक बात और विशेष है कि अगर माता पिता में से कोई पहले अपनी जीवन यात्रा पूरी करके चले जाते है तो पीछे रहने वाले माता पिता में से जो भी हो, उनकी केयर अधिक करनी है, उनसे बात करना, उनके अकेलेपन को दूर करने की जिम्मेदारी भी हमारी है। दोस्तों ऐसे समय में हमारी जिम्मेदारी और अधिक बन जाती है कि उन्हें कभी भी अपने जीवन साथी की कमी खले नहीं। साथियों जो चले जाते है वो कभी हमे नहीं मिलते है, यह बहुत ही मार्मिक बात है। जिन मातापिता के बिना हम एक कदम भी नहीं रख पाते थे वो इतने बेगाने कैसे हो जाते है, उनकी कैसे पैसे से तुलना की जाने लगती है, उनके सामने धन क्यों प्रिय लगने लगता है, उनकी फिक्र क्यों खराब लगने लगती है? जो चले जाएंगे वो कभी नहीं आयेंगे, ऐसा विचार कर अपने मातापिता की सेवा करें, उनकी हर बात माने, उन्हें सम्मान देना सीखें और अपने पितृ ऋण से ऊऋण होने का प्रयत्न करें।
जय हिंद, वंदे मातरम
