सच्चा शिष्य गुरु से गुरु को ही मांगता है: साध्वी किरण भारती
mahendra india nesws, new delhi
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा हुड्डा, सिरसा स्थित 1544/20 में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। प्रात: 9:00 बजे से 11:00 बजे तक आयोजित इस सत्संग में साध्वी किरण भारती ने गुरु की महिमा एवं सच्चे शिष्य के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए प्रेरणादायी आध्यात्मिक संदेश दिया। साध्वी किरण भारती ने कहा कि सच्चा शिष्य वह नहीं जो गुरु से सांसारिक सुख-सुविधाएं या भौतिक उपलब्धियां मांगता है, बल्कि सच्चा शिष्य वह है जिसकी सबसे बड़ी अभिलाषा स्वयं गुरु को पाना होती है। गुरु के प्रति ऐसी निष्काम श्रद्धा और समर्पण ही शिष्य के जीवन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर ले जाता है।
इसी भाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस जी एवं उनके शिष्य नरेंद्र का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि गुरु ने नरेंद्र की आध्यात्मिक पात्रता और उनके अंतर्मन की अभिलाषा को परखने के लिए उन्हें अपनी इच्छा व्यक्त करने का अवसर दिया। नरेंद्र के सामने सांसारिक प्राप्तियों का मार्ग खुला था, लेकिन उनके हृदय की वास्तविक चाह गुरु के माध्यम से परम सत्य की प्राप्ति थी। गुरु के प्रति उनकी यह निष्ठा ही आगे चलकर उनके आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला बनी। साध्वी जी ने इसी भाव को गुरु गोबिंद सिंह जी एवं उनके शिष्य शामिर के प्रसंग से जोड़ते हुए बताया कि गुरु ने जब शिष्य को वरदान मांगने का अवसर दिया, तब उसकी परीक्षा केवल इस बात की नहीं थी कि वह क्या मांगता है, बल्कि यह जानना था कि उसकी चेतना की वास्तविक अभिलाषा क्या है। शामिर ने भी सांसारिक वस्तु की अपेक्षा गुरु को ही पाने की इच्छा व्यक्त की।
यह प्रसंग बताता है कि जब शिष्य के लिए गुरु ही उसकी सर्वोच्च प्राप्ति बन जाते हैं, तब उसकी भक्ति निष्काम एवं पूर्ण समर्पण में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनेक साधनों और व्यक्तियों का सहारा लेता है, लेकिन आध्यात्मिक पथ पर सच्चा शिष्य अपनी इच्छाओं से ऊपर उठकर गुरु के ज्ञान और गुरु-कृपा को अपनी सर्वोच्च संपदा मानता है। गुरु का उद्देश्य भी शिष्य को बाहरी उपलब्धियों में उलझाना नहीं, बल्कि उसे ब्रह्मज्ञान के माध्यम से उसके वास्तविक स्वरूप का बोध करवाना है। इस अवसर पर साध्वी पूनम भारती जी ने गुरु महिमा एवं प्रभु भक्ति से ओत-प्रोत सुमधुर भजनों का गायन किया। भजनों ने पूरे वातावरण को भक्तिरस से भर दिया और उपस्थित संगत भाव-विभोर हो उठी। सत्संग के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा मिली कि गुरु से कुछ पाने की अपेक्षा रखने के स्थान पर यदि शिष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा गुरु के ज्ञान, गुरु की कृपा और परम सत्य की प्राप्ति बन जाए, तो यही सच्चे शिष्यत्व की पहचान है।
सच्चा शिष्य गुरु से गुरु को ही मांगता है: साध्वी किरण भारती
सिरसा। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा हुड्डा, सिरसा स्थित 1544/20 में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। प्रात: 9:00 बजे से 11:00 बजे तक आयोजित इस सत्संग में साध्वी किरण भारती ने गुरु की महिमा एवं सच्चे शिष्य के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए प्रेरणादायी आध्यात्मिक संदेश दिया। साध्वी किरण भारती ने कहा कि सच्चा शिष्य वह नहीं जो गुरु से सांसारिक सुख-सुविधाएं या भौतिक उपलब्धियां मांगता है, बल्कि सच्चा शिष्य वह है जिसकी सबसे बड़ी अभिलाषा स्वयं गुरु को पाना होती है। गुरु के प्रति ऐसी निष्काम श्रद्धा और समर्पण ही शिष्य के जीवन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर ले जाता है। इसी भाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस जी एवं उनके शिष्य नरेंद्र का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि गुरु ने नरेंद्र की आध्यात्मिक पात्रता और उनके अंतर्मन की अभिलाषा को परखने के लिए उन्हें अपनी इच्छा व्यक्त करने का अवसर दिया। नरेंद्र के सामने सांसारिक प्राप्तियों का मार्ग खुला था, लेकिन उनके हृदय की वास्तविक चाह गुरु के माध्यम से परम सत्य की प्राप्ति थी। गुरु के प्रति उनकी यह निष्ठा ही आगे चलकर उनके आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला बनी। साध्वी जी ने इसी भाव को गुरु गोबिंद सिंह जी एवं उनके शिष्य शामिर के प्रसंग से जोड़ते हुए बताया कि गुरु ने जब शिष्य को वरदान मांगने का अवसर दिया, तब उसकी परीक्षा केवल इस बात की नहीं थी कि वह क्या मांगता है, बल्कि यह जानना था कि उसकी चेतना की वास्तविक अभिलाषा क्या है। शामिर ने भी सांसारिक वस्तु की अपेक्षा गुरु को ही पाने की इच्छा व्यक्त की। यह प्रसंग बताता है कि जब शिष्य के लिए गुरु ही उसकी सर्वोच्च प्राप्ति बन जाते हैं, तब उसकी भक्ति निष्काम एवं पूर्ण समर्पण में परिवर्तित हो जाती है। उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अनेक साधनों और व्यक्तियों का सहारा लेता है, लेकिन आध्यात्मिक पथ पर सच्चा शिष्य अपनी इच्छाओं से ऊपर उठकर गुरु के ज्ञान और गुरु-कृपा को अपनी सर्वोच्च संपदा मानता है। गुरु का उद्देश्य भी शिष्य को बाहरी उपलब्धियों में उलझाना नहीं, बल्कि उसे ब्रह्मज्ञान के माध्यम से उसके वास्तविक स्वरूप का बोध करवाना है। इस अवसर पर साध्वी पूनम भारती जी ने गुरु महिमा एवं प्रभु भक्ति से ओत-प्रोत सुमधुर भजनों का गायन किया। भजनों ने पूरे वातावरण को भक्तिरस से भर दिया और उपस्थित संगत भाव-विभोर हो उठी। सत्संग के माध्यम से श्रद्धालुओं को यह प्रेरणा मिली कि गुरु से कुछ पाने की अपेक्षा रखने के स्थान पर यदि शिष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा गुरु के ज्ञान, गुरु की कृपा और परम सत्य की प्राप्ति बन जाए, तो यही सच्चे शिष्यत्व की पहचान है।
