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चैत्र नवरात्र : आखिर क्यों होती है अष्टमी के बिना अधूरी नवरात्र की पूजा? जानिए इस तिथि का महत्व और कन्या पूजन विधि

 
Chaitra Navratri: Why is Navratri considered incomplete without Ashtami? Learn about the significance of this date and the method of worshipping girls
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 Chaitra Navratri: Why is Navratri considered incomplete without Ashtami? Learn about the significance of this date and the method of worshipping girls

mahendra india news, new delhi
 नवरात्र की अष्टमी तिथि मां दुर्गा के महागौरी' स्वरूप को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक इसी दिन मां काली, सरस्वती और लक्ष्मी की शक्तियां एक होकर महिषासुर का वध करने के लिए तैयार हुई थीं। अष्टमी की रात को मां कालरात्रि के साथ-साथ संधि पूजा का भी विधान है, जो अष्टमी और नवमी के मिलन का समय होता है। आध्यात्मिक रूप से यह तिथि भक्तों के सभी पापों के नाश करती है और सुख-शांति प्रदान करती है।

ज्योतिषचार्य पंडित लालचंद शर्मा ने बताया कि चैत्र नवरात्र शक्ति उपासना के लिए बेहद मंगलकारी मानी जाती है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है, लेकिन 'महाअष्टमी' का दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि अगर आपने नौ दिनों तक व्रत रखे हैं, लेकिन अष्टमी के दिन विधि-विधान से पूजा और कन्या पूजन नहीं किया, तो आपकी पूजा अधूरी रह सकती है। 

कब है अष्टमी पूजन
ज्योषिचार्य पंडित नीरज शर्मा ने बताया कि चैत्र नवरात्र की अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 दोपहर 01 बजकर 50 मिनट से शुरू होगी। वहीं, इसका समापन
26 मार्च 2026 सुबह 11 बजकर 48 मिनट पर होगा। ऐसे में 26 मार्च 2026 को महाअष्टमी मनाई जाएगी।महाअष्टमी का 

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कन्या पूजन की सही विधि 
अष्टमी पूजन से पहले कन्याओं को एक दिन पहले ही प्यार और सम्मान से आमंत्रित करें।
इस पूजा के लिए कन्याओं की संख्या 9 होनी चाहिए, साथ में एक लंगूर लडक़े को भी जरूर हो।
कन्याओं के आवास आने पर सबसे पहले उनके पैरों को साफ पानी या दूध से धोएं और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें।


इसके बाद सभी कन्याओं को साफ आसन पर बिठाएं और उनके माथे पर कुमकुम का तिलक लगाकर अक्षत लगाएं।
उनके हाथों में कलावा बांधें।
माता दुर्गा को प्रिय हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद कन्याओं को श्रद्धापूर्वक खिलाएं।
ध्यान रहे कि भोजन सात्विक हो और उसमें लहसुन-प्याज का प्रयोग न हो।
इसके बाद भोजन करवाएख्, कन्याओं को फल, सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा और उपहार देकर विदा करें।


अंत में उनके पैर छूना न भूलें।