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लोवर धर्म और हायर धर्म के बीच निर्णय लेना हो तो उच्च धर्म के लिए कार्य करो, लोवर धर्म को त्याग दें

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If you have to decide between lower religion and higher religion, work for the higher religion and abandon the lower religion

 mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
यहां विषय पर आने से पहले दो बातों को स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि धर्म क्या है तथा लोवर धर्म वा हॉयर धर्म की क्या परिभाषा है? सनातन संस्कृति के सभी ग्रंथ इस बात की पैरवी करते है कि धर्म हमारा कर्तव्य है, उस कर्तव्य का पालन करना ही हम सभी का धर्म है। श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े स्पष्ट रूप से बताया है कि धर्म हमारा कर्तव्य है। जब हम धर्म या कर्तव्य की बात करते है तो हमे अलग अलग स्तर पर कार्य करने होते है, जैसे निज हित के कर्तव्य, फिर परिवार हित के कर्तव्य, फिर समाज हित के कार्य तथा उससे भी ऊपर का कर्तव्य राष्ट्र हित के कार्य होते है। यहां हम जब लोवर धर्म की बात करते है तो खुद के हितार्थ होने वाले कर्तव्य के पालन की बात करते है, खुद की संतुष्टि के लिए किए गए कर्तव्य लोअर स्टार के होते है,

उससे ऊपर की हमारी ड्यूटी परिवार या कुटुम्ब के हितार्थ जो कार्य होते है वो आते है, उससे भी ऊपर समाज के हितार्थ कार्यों को माना जाता है, और सबसे ऊपर राष्ट्र के हितार्थ जो कार्य किए जाते है उनका नंबर आता है और वही कर्तव्य सर्वोच्च माने जाते है, उसी को हम सनातन संस्कृति की भाषा में हाइयर धर्म कहते है। यहां मैने जो लोअर धर्म या कर्तव्य का जिक्र किया है वो निजी हितार्थ जो कर्तव्य निभाए जाते है वो आते है, तथा हॉयर धर्म में जो कर्तव्य राष्ट्र के हितार्थ निभाए जाते है वो आते है, इन्हीं को जानने की जरूरत है। कई दिनों से बहुत से लोग दीपावली के अवसर पर पटाखे फोड़ने को अच्छा बुरा कहते हुए सुने गए,

कोई कह रहा है कि पटाखे फोड़ने जरूरी है क्योंकि दीपावली के अवसर पर ऐसा होना चाहिए, कुछ कह रहे है कि ये पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है, कुछ कह रहे है कि ये हमारी परंपराएं है इसे तो निभाना ही पड़ेगा, तो कुछ कह रहे है कि जो अस्थमा के रोगी है उनके लिए ये हानिकर है, ये हमारे पर्यावरण के लिए हानिकर है। यहां हमे क्या समझने की जरूरत है, किस की सुनने की जरूरत है, या किसी के तुष्टिकरण की जरूरत है या फिर राष्ट्रहित देखने की आवश्यकता है। हम सभी जानते है कि जब हम राष्ट्र प्रथम की अवधारणा पर चलने की बात करते है तो फिर हमे अपने खुद के या यूं कहे कि निजी हित त्यागने की जरूरत है,

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अगर हमे अस्थमा के पेशंट का ध्यान करना है तो फिर परंपरा के अनुसार नहीं चलना है, अगर हमे जलवायु परिवर्तन पर विचार करना है तो फिर हमे कुछ त्यागना तो पड़ेगा ही, अगर हम राष्ट्र प्रथम की चाह रखते है तो खुद की इगो को तो निश्चित ही त्यागना पड़ेगा क्योंकि हर परेशानी अहंकार से शुरू होती है, क्योंकि एक व्यक्ति या एक त्यौहार से बड़ा है राष्ट्र, और राष्ट्र की क्या आवश्यकता है कि हमारे सभी नागरिक स्वस्थ रहे, हमारा पर्यावरण शुद्ध रहे, हमारा खानपान शुद्ध रहे तथा सभी जीव सुखी रहे। यहां हम अगर एक दूसरे में तुलना करने लगेंगे तो फिर हम बहुत निजी हित की ही बात करते है, अपने कंफर्ट जोन की ही बात करते है, अगर हम एक दूसरे को नीचा दिखाने की बात करेंगे तो फिर हम राष्ट्र प्रथम की अवधारणा से बहुत दूर चले जाएंगे है, दोस्तों ये राष्ट्र इंसानों के अलावा पशु पक्षियों का भी है, बीमार हुए लोगों का भी है, खेतखलिहानों का भी है, पेड़ पौधों का भी है, पहाड़ों पर पड़ी बर्फ का भी है,

ये राष्ट्र हर उसका है जो इस सीमा में रहता है, हम राष्ट्र प्रथम की बात करनी होगी, अपने हाइयर धर्म का पालन करना होगा। श्रीमद्भगवद् गीता के कई पवित्र श्लोक है जो हमे इसे विस्तार से समझाने के लिए है लेकिन गीता के अध्याय 18 के 66 वे श्लोक में कहा गया है कि "स्वधर्मानपरित्यज्य मामेकम शरणम् व्रज। अहम त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच"।। अर्थात अपने लोवर धर्म को त्याग कर मेरी शरण में आ जा, मै तुम्हारे सारे पापों से छुटकारा दिलाकर मोक्ष यानि सर्वश्रेष्ठता को प्राप्त कराऊंगा।

यहां यह भी स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि अपने निज धर्म अर्थात कर्तव्य को छोड़कर सर्वश्रेष्ठ कार्यों में लगे अर्थात राष्ट्र के कार्यों में लगे और इससे तुम्हारा कल्याण होगा, सर्वश्रेष्ठ स्थान को प्राप्त कर पाएंगे। यहां ये भी जानना आवश्यक है कि धर्म अंग्रेजी का रिलीज़न नहीं है, धर्म ड्यूटी है, कर्तव्य है, इसीलिए तो हर व्यक्ति का धर्म अलग अलग होता है, इसमें वो व्यक्ति विभिन्न रिश्तों में रहते हुए रिश्तों के अनुसार अपना धर्म निभाते है, अलग अलग व्यवसाय में होते हुए अपने व्यवसायिक धर्म को निभाने का कार्य करते है, आयु के अनुसार अपने अपने धर्म निभाए जाते है। रिलीज़न केवल पूजा पद्धति है, कर्मकांड की पद्धति है, इसे धर्म के साथ कन्फ्यूज नहीं करना चाहिए, वैसे भी हमारे सभी ज्ञान के ग्रंथों ने धर्म की परिभाषाएं दी है जिसमें कही भी पूजा पद्धति का जिक्र नहीं है,

उनमें मानव मूल्यों का जिक्र है, जिसमें धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच संतोष, ब्रह्मचर्य या इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, अक्रोध, सत्य, अहिंसा जैसे मानवीय गुणों को ही धर्म के लक्षण बताएं है, इसलिए धर्म के अनुसार जीवन जीना ही मनुष्य का कर्तव्य होता है। जब भगवान श्री कृष्ण जी महाराज से अर्जुन पूछते है कि हे केशव मै मेरे कर्तव्य के प्रति कन्फ्यूज हूँ मुझे क्या करना चाहिए तो श्रीकृष्ण जी महाराज ने कहा था कि अर्जुन तुम क्षत्रिय हो और क्षत्रिय धर्म का पालन करो, उठो और युद्ध करो। कर्तव्य ही धर्म है इसे सभी को समझने की आवश्यकता है। यहां एक बात पुनः लोवर धर्म वा हाइयर धर्म को समझने की जरूरत है क्योंकि अधिकतर लोगों को तो धर्म ही समझ नहीं आता है, लोअर धर्म निजी हित तथा हाइयर धर्म राष्ट्र हित होता है, इसे सभी को स्पष्टता के साथ समझना चाहिए,

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जो लोग खुद की भलाई या खुद की इमेज चमकाने के लिए कार्य करते है वो लोअर धर्म पर अटक जाते है और जो लोक कल्याण या राष्ट्र कल्याण के लिए कार्य करते है वो हाइयर धर्म का पालन करते है। यहां हर इंसान को इसी तरह से अपने सभी कर्तव्यों का वर्गीकरण करना चाहिए जिससे उच्च धर्म का पालन किया जा सकें।
जय हिंद, वंदे मातरम