भादरा में राधास्वामी सत्संग दिनोद के परम संत हुज़ूर कंवर साहेब जी महाराज का सत्संग, युवाओं को दिया संदेश
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लगन, विश्वास और सत्संग से ही मन पर विजय संभव : परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज
इंसान की किसी भाव या वस्तु के प्रति प्रीति, लगन और विश्वास होना अत्यंत आवश्यक है। बिना लगन के सफलता संभव नहीं। विद्यार्थी लगन के बिना शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता, जमींदार लगन के बिना फसल नहीं पा सकता और भगत लगन के बिना भक्ति नहीं कर सकता। इसलिए जीवन में जिस लक्ष्य को पाना है, उसके प्रति सच्ची लगन और दृढ़ विश्वास जरूरी है।यह सत्संग वचन परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने राजस्थान प्रांत के भादरा कस्बे में राजगढ़ रोड पर स्थित राधास्वामी आश्रम में फ़रमाए।हुज़ूर महाराज ने कहा कि मन को साध लिया जाए तो भक्ति भी सध जाएगी, क्योंकि यही मन है जो भगत को जगत में उलझाता है। जब भी मन को प्रभु भक्ति की ओर मोड़ा जाता है तो वह उदासीन होने लगता है, जबकि संसार के रसों में लगाए रखने पर वही मन प्रसन्न रहता है।

इसलिए इंसान को सतगुरु से प्रीत लगानी है, नाम में लगन लगानी है और सत्संग पर विश्वास रखना है। ऐसा करने से मन भी सध जाएगा और भक्ति भी कमाई जा सकेगी।गुरु महाराज ने फ़रमाया कि मनमुखता को त्यागकर गुरुमुखता अपना लोगे तो जीवन के सारे कारज सुधरने लगेंगे। गुरुमुखता का अर्थ है अपने आप को सर्वस्व रूप से गुरु को सौंप देना। यह कार्य कोई विरला हरिजन और सच्चा शूरवीर ही कर सकता है। उन्होंने कहा कि शूरवीर वह नहीं जो संसार को जीत ले, बल्कि वह है जो अपने मन को जीत ले, क्योंकि मन के जीते जीत है और मन के हारे हार।
हुज़ूर कँवर साहेब ने कबीर साहेब और सर्वजीत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वास्तविक ज्ञान केवल ग्रंथों को पढ़ने या अपने शास्त्रीय ज्ञान पर गर्व करने में नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारकर मन और अहंकार पर विजय प्राप्त करने में है। उन्होंने कहा कि ग्रंथों का बोझ सिर पर होना और ज्ञान का प्रकाश भीतर होना, दोनों अलग बातें हैं। सतगुरु मनुष्य को बाहरी ज्ञान से आंतरिक ज्ञान की ओर ले जाते हैं। जब सतगुरु की शरणाई मिलती है, सतनाम में लगन लगती है और सत्संग पर विश्वास दृढ़ होता है, तब मनुष्य को अपनी वास्तविक हार और जीत का बोध होता है। मन को जीत लेना ही सच्ची जीत है।हुज़ूर साहेब ने कहा कि तुलसीदास हों या कालिदास, जब जीवन में ज्ञान का फटका लगता है तो पूरा जीवन बदल जाता है। उन्होंने समझाया कि यह ज्ञान का फटका सतगुरु की शरणाई से लगता है। सतगुरु की संगति और सत्संग मनुष्य को भीतर झाँकने तथा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देती है।गुरु महाराज ने मन की चंचलता और उसके छल को समझाते हुए कहा कि जैसे चूहे के पीछे बिल्ली दाँव लगाए बैठी रहती है, वैसे ही मन भी जीव पर दाँव लगाए बैठा रहता है। इसलिए मन को साधने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभ्यास केवल किसी आसन पर बैठ जाने का नाम नहीं, बल्कि नित्य-प्रतिदिन स्वयं को साधने और अपने मन को सही दिशा में लगाने की साधना है।हुज़ूर महाराज ने सुंदर उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मूँज को बार-बार कूटने से उसमें नरमाई आती है और फिर उससे मजबूत रस्सी बनाई जाती है, वैसे ही मन की बार-बार कुटाई अर्थात निरंतर साधना से मन नरम और संस्कारित होता है तथा वही मन सत्संग और भक्ति से जुड़ने लगता है।हुज़ूर कँवर साहेब ने लालच को काल के जाल का प्रमुख कारण बताते हुए फ़रमाया कि जैसे मछली काँटे पर लगे मांस के लालच में फँस जाती है, वैसे ही काल महाराज सांसारिक सुखों के लालच में जीव को उलझाते हैं। इंसान जो उसे मिल गया है उसमें खुश नहीं रहता, बल्कि और पाने के लालच में कई बार वह उस सुख को भी खो देता है जो उसके पास पहले से मौजूद है।
गुरु महाराज ने कर्म की अटलता समझाते हुए कहा कि दूसरे को दी गई पीड़ा एक दिन आपको भी रुलाएगी, इसे कभी मत भूलो। कर्म कभी मिटता नहीं, वह खड़ा रहता है और समय आने पर उसका फल अवश्य मिलता है। महाभारत में भीष्म पितामह का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों का फल भी मनुष्य को भोगना पड़ता है और इसी कर्मफल के कारण भीष्म पितामह को बाणों की शैया पर सोना पड़ा।हुज़ूर महाराज ने कहा कि क्षणभर सुख देने वाली सांसारिक वस्तुओं को पाने के लिए मनुष्य अपना पूरा जीवन लगा देता है, लेकिन जो वस्तु इस जगत और अगत दोनों को सुखी बनाने वाली है, उसका संग्रह नहीं करता। वह वस्तु परमात्मा की भक्ति है।
उन्होंने कहा कि संसार एक मीठी जेल के समान है। इस जेल के सुख में इतना मत डूबो कि इससे बाहर निकलने का उपाय ही भूल जाओ, बल्कि जीवन रहते इससे मुक्ति का मार्ग तलाशो।सत्संग के अंत में हुज़ूर कँवर साहेब जी महाराज ने सामाजिक जीवन को भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बताते हुए कहा कि घरों में प्यार और प्रेम का वातावरण बनाओ। बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार दो और अपने माता-पिता तथा बड़े बुजुर्गों का सम्मान करो। उन्होंने कहा कि बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, बल्कि हमारे आचरण को देखकर सीखते हैं। आज आप अपने बच्चों को जैसा व्यवहार करते हुए दिखा रहे हैं, कल वही व्यवहार वे अपने जीवन में दोहराएँगे। इसलिए परिवार में प्रेम, सम्मान, संस्कार और सदाचार की परंपरा स्थापित करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
