हरिद्वार का दक्षेश्वर महादेव मंदिर बेहद चमत्कारी, श्राद्ध में शिव पूजा और दर्शन से दूर होता है पितृ दोष
mahendra india news, new delhi
उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर की बहुत ही मान्यता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ दोष की वजह से जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और कार्यों में सफलता प्राप्त नहीं होती है। इस दोष को दूर करने के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं, जिससे पितृ दोष के प्रभाव को कम किया जा सके।
उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर देश में एक ऐसा मंदिर है, जहां महादेव पर जल अर्पित करने और दर्शन मात्र से इस दोष से छुटकारा मिलता है। यह मंदिर भगवान शिव और माता सती को समर्पित है। यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। पितृ पक्ष के दौरान इस मंदिर में महादेव के दर्शन और पूजा करने के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। ऐसे में इस आर्टिकल में आपको इस मंदिर से जुड़ी बातें बताते हैं।
दक्षेश्वर महादेव मंदिर
आपको बता दें कि यह प्राचीन मंदिर कनखल के दक्षिणी छोर पर स्थित है। पितृ पक्ष के दौरान दक्षेश्वर महादेव मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग और पौराणिक यज्ञ कुंड है, जिसे माता सती के आत्मदाह से जोडक़र देखा जाता है। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1810 में रानी धनकौर ने करवाया था और 1962 में इसका जीर्णोद्धार किया गया। इस मंदिर से हिंदू पौराणिक कथाएं और गहरा इतिहास जुड़ा हुआ है।
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर में शिव जी के दर्शन और पूजा करने से भक्तों को पितृ दोष की समस्या से छुटकारा मिलता है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। यज्ञ में आमंत्रित न किए जाने पर महादेव क्रोधित हुए। वहीं, जब इस यज्ञ का पता माता सती को चला, तो उन्होंने महादेव से यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी, लेकिन शिव जी ने मना कर दिया।
इसके बाद माता सती ने महादेव की बात नहीं मानी और यज्ञ में जाने का फैसला किया। यज्ञ में पहुंचने पर माता सती को अपने पिता के कठोर वचन और पति का घोर अपमान सहना पड़ा। इस पीड़ा को न सह पाने के कारण देवी ने एक कठोर कदम उठाया और यज्ञ की अग्नि में कूदकर स्वयं को भस्म कर लिया।
इसके बाद महादेव अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने भारी तबाही मचा दी। उन्होंने अहंकारी राजा दक्ष का सिर काटने के लिए अपने गण वीरभद्र को भेजा। बाद में, देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी ने राजा दक्ष को क्षमा कर दिया और उन्हें बकरे का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया।
