शीतला देवी को क्‍यों कहा जाता है इन्‍हें आरोग्‍य की देवी? स्वयं शिव जी ने रचा है इनका पूजा स्‍तोत्र

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Why is Sheetla Devi called the goddess of health? Lord Shiva himself has composed her worship hymn
mahendra india news, new delhi

शीतला देवी की पूजा घरों में की जाती है। शीतला देवी को लेकर काफी मान्यता है। इनकी पूजा करने से विशेष फल मिलता है। वैसे हर वर्ष चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को शीतला देवी की पूजा होती है। शीतला सप्‍तमी का उपवास रखा जाता है। घरों के अंदर कई प्रकार के व्यजंन बनाए जाते हैं और फिर शीतला अष्‍टमी पर देवी को इन बासी और ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाता है। 

शीतला माता की पूजा के दौरान बासी भोजन का भोग लगाए जाने के कारण इसे बासौड़ा पर्व कहते हैं।  शीतला माता को चेचक रोग की देवी भी कहते हैं। बताया गया है कि मान्‍यता अनुसार शीतला माता की पूजा करने से कई रोग नहीं होती हैं, बॉडी निरोगी रहता है. विशेष तौर पर छोटे बच्‍चों को चेचक और चिकनपॉक्‍स जैसी बीमारियों से बचाने के लिए शीतला देवी की पूजा की जाती है। जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा.

क्रोध अग्नि से जलने लगी थी प्रजा
बताया गया है कि स्कंद पुराण में दी गई शीतला माता की पौराणिक कथा के मुताबिक शीतला देवी का जन्म ब्रह्माजी से हुआ था। शीतला देवी को भगवान शिव जी की अर्धांगिनी शक्ति का ही स्वरूप माना जाता है, जब शीतला देवी अपने हाथ में दाल के दाने लेकर भगवान शिव के पसीने से बने ज्वरासुर के साथ धरती लोक पर आईं और राजा विराट के प्रदेश में रहने के लिए पहुंचीं तो राजा विराट ने देवी शीतला को प्रदेश में रहने से मना कर दिया.

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इससे देवी शीतला क्रोधित हो गई, शीतला देवी के क्रोध की अग्नि से राजा की प्रजा जलने लगी। उनकी त्‍वचा पर लाल दाने हो गये। इसके बाद राजा विराट ने अपनी गलती पर माफी मांगी। इसी के साथ ही शीतला देवी की पूजा करके उन्‍हें कच्चा दूध और ठंडी लस्सी का भोग लगाया, इसके बाद ही शीतला देवी का क्रोध शांत हुआ, इसके बाद  से माता देवी को ठंडे पकवानों का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है.
अनूठा है माता का रूप
शीतला देवी का रूप भी बेहद अनूठा है, देवी के एक हाथ में झाड़ू और नीम के पत्‍ते होते हैं तो दूसरे हाथ में शीतल पेय का कलश, दाल के दाने और रोगाणुनाशक जल होता है, उनके साथ चौसठ बीमारियों के देवता, घेंटूकर्ण त्वचा रोग के देवता, हैजे की देवी और ज्वारासुर ज्वर का दैत्य होते हैं।  स्कंदपुराण के मुताबिक देवी शीतला के पूजा स्तोत्र शीतलाष्टक की रचना स्वयं भगवान शिव ने की थी. शीतला माता को भगवान शिव की अर्धांगिनी शक्ति का ही स्वरूप माना जाता है। 


नोट : ये समाचार केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है, इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की सहायता ली है, इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं। 

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